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कभी देखो तो मौजों का तड़पना कैसा लगता है

अब्दुल हमीद

कभी देखो तो मौजों का तड़पना कैसा लगता है

अब्दुल हमीद

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    कभी देखो तो मौजों का तड़पना कैसा लगता है

    ये दरिया इतना पानी पी के प्यासा कैसा लगता है

    हम उस से थोड़ी दूरी पर हमेशा रुक से जाते हैं

    जाने उस से मिलने का इरादा कैसा लगता है

    मैं धीरे धीरे उन का दुश्मन-ए-जाँ बनता जाता हूँ

    वो आँखें कितनी क़ातिल हैं वो चेहरा कैसा लगता है

    ज़वाल-ए-जिस्म को देखो तो कुछ एहसास हो इस का

    बिखरता ज़र्रा ज़र्रा कोई सहरा कैसा लगता है

    फ़लक पर उड़ते जाते बादलों को देखता हूँ मैं

    हवा कहती है मुझ से ये तमाशा कैसा लगता है

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    अब्दुल हमीद

    अब्दुल हमीद,

    अब्दुल हमीद

    कभी देखो तो मौजों का तड़पना कैसा लगता है अब्दुल हमीद

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    ગુજરાતી ભાષા-સાહિત્યનો મંચ : રેખ્તા ગુજરાતી

    ગુજરાતી ભાષા-સાહિત્યનો મંચ : રેખ્તા ગુજરાતી

    મધ્યકાલથી લઈ સાંપ્રત સમય સુધીની ચૂંટેલી કવિતાનો ખજાનો હવે છે માત્ર એક ક્લિક પર. સાથે સાથે સાહિત્યિક વીડિયો અને શબ્દકોશની સગવડ પણ છે. સંતસાહિત્ય, ડાયસ્પોરા સાહિત્ય, પ્રતિબદ્ધ સાહિત્ય અને ગુજરાતના અનેક ઐતિહાસિક પુસ્તકાલયોના દુર્લભ પુસ્તકો પણ તમે રેખ્તા ગુજરાતી પર વાંચી શકશો

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