आज के चुनिन्दा 5 शेर

ज़बाँ ज़बाँ पे शोर था कि रात ख़त्म हो गई

यहाँ सहर की आस में हयात ख़त्म हो गई

महताब ज़फ़र
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अजीब होते हैं आदाब-ए-रुख़स्त-ए-महफ़िल

कि वो भी उठ के गया जिस का घर था कोई

सहर अंसारी
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इश्क़ में ये मजबूरी तो हो जाती है

दुनिया ग़ैर-ज़रूरी तो हो जाती है

आफ़ताब इक़बाल शमीम

मिरी मुश्किल मिरी मुश्किल नहीं है

वसीला तेरी आसानी का मैं हूँ

ख़ुर्शीद तलब

होगा बहुत शदीद तमाज़त का इंतिक़ाम

साए से मिल के रोएगी दीवार देखना

इम्तियाज़ साग़र
आज का शब्द

समन

  • saman
  • سمن

शब्दार्थ

Jasmine

गुल कभू हम को दिखाती है कभी सर्व-ओ-समन

अपने गुल-रू बिन हमें क्या क्या खिजाती है बहार

शब्दकोश

Quiz A collection of interesting questions related to Urdu poetry, prose and literary history. Play Rekhta Quiz and check your knowledge about Urdu!

Ameer Meenai was a contemporary of which of these poets?
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क्या आप जानते हैं?

असरार-उल-हक़

अस्रारुल हक़ मजाज़ के बारे में उर्दू के एक बड़े शायर ने कहा था, "उर्दू शायरी में एक कीट्स पैदा हुआ था जिसे तरक़्क़ीपसंद भेड़िए उठा ले गए।" रूमान और इंक़िलाब के इस अद्वितीय शायर को मदिरापान की अधिकता ने जीने की ज़्यादा मुह्लत नहीं दी। उनकी शायरी के साथ साथ उनकी हास्यवृत्ति और हाज़िर जवाबी भी बहुत मशहूर है।
एक बार लखनऊ में राजा महमूदाबाद ने मजाज़ को नसीहत करते हुए बड़े प्यार से समझाया, "देखो मियां, अगर तुम शराब पीना छोड़ दो तो मैं तुम्हारे गुज़ारे के लिए चार सौ रुपये मासिक वज़ीफ़ा निर्धारित कर दूंगा।"
मजाज़ ने बड़े अदब से जवाब दिया, "मगर राजा साहब, ये तो सोचिए कि अगर मैं शराब ही पीना छोड़ दूं तो फिर चार सौ रुपयों का क्या करूंगा?"
यही हास्यवृत्ति बड़ी हद तक उनके सगे भांजे मशहूर शायर और फ़िल्मी गीतकार, स्क्रिप्ट राइटर जावेद अख़्तर के हिस्से में भी आई है।

क्या आप जानते हैं?

शब्द पैमाना सुनते ही शराब के जाम का ख़्याल आता है लेकिन पैमाना सिर्फ़ मयख़ाने में ही नहीं बच्चों के स्कूल के बस्तों में भी मिलता है। वो कैसे?
क्योंकि दोनों का संबंध पैमाइश यानी नापने से है। "पैमाना" असल में किसी चीज़ की मात्रा, वज़न या लम्बाई चौड़ाई,मोटाई और तापमान आदि नापने के मानक उपकरण को कहते हैं।
बच्चे स्कूल के बस्ते में जो Scale रख कर ले जाते हैं उसको उर्दू में पैमाना कहते हैं और अक्सर उसको फ़ुटा भी कहा जाता है। अक्सर उससे बच्चों की पिटाई भी हो जाती है। किसी द्रव्य को नापने के लिए भी किसी बर्तन में डाला जाता है, उस बर्तन को पैमाना ही कहा जाता है। शराब को नाप कर डालने वाला बर्तन भी पैमाना कहा गया है जो उर्दू शायरी में कभी गर्दिश में रहता है, कभी छलकता है। सब्र का पैमाना छलकने के मायने हैं बर्दाश्त से ज़्यादा हो जाना और शराफ़त का पैमाना शराफ़त परखने के मायने में आता है।

क्या आप जानते हैं?

निदा

निदा फ़ाज़ली (1938-2016) जिनका असली नाम मुक़्तदा हसन फ़ाज़ली था शायर और फ़िल्मी गीतकार के रूप में तो बहुत मशहूर हैं ही लेकिन उन्होंने अपनी जीवनी भी बहुत अलग अंदाज़ में लिखी है।
"दीवारों के बाहर","दीवारों के बीच" उनकी दो आत्म कथात्मक रचनाएं हैं जिनमें वह एक सूत्रधार की तरह अपनी ज़िंदगी की कहानी बयान करते हैं। कहीं प्रथम पुरुष अर्थात "मैं" का इस्तेमाल नहीं किया है,हर जगह अपना तख़ल्लुस "निदा" उपन्यास के एक पात्र की तरह इस्तेमाल किया है। इन आत्म कथात्मक उपन्यासों के सारे पात्र अपने असली नामों के साथ साथ शामिल हैं, सारी घटनाएं वास्तविक हैं।
निदा फ़ाज़ली ने बड़ी बेबाकी से अपने परिवार, ग्वालियर में अपने बचपन और छात्र जीवन, बम्बई के अनुभवों व घटनाओं और प्रेम प्रसंगों के बारे में लिखा है और उतनी ही बेबाकी से दूसरे लोगों के बारे में भी लिखा है। उनमें साहित्य और फ़िल्मी दुनिया के बहुत से मशहूर नाम भी शामिल हैं, जिस पर उन में से कई लोग उनसे नाराज़ भी हो गए थे।

क्या आप जानते हैं?

मुईन

"मरने की दुआएं क्यों मांगूं जीने की तमन्ना कौन करे" मुईन अहसन जज़्बी (1912-2005) की यह मशहूर ग़ज़ल भारत-पाक की फ़िल्मों में दो बार गाई गई लेकिन दोनों बार उन्हें इसका क्रेडिट नहीं दिया गया।
सन् 1948 में बनी फ़िल्म "ज़िद्दी" के लिए किशोर कुमार ने यह ग़ज़ल गाई थी। इस्मत चुग़ताई के शौहर शाहिद लतीफ़ ने फ़िल्म बनाई थी और उसकी कहानी इस्मत चुग़ताई ने लिखी थी। सन् 1970 में यही ग़ज़ल हबीब वली मोहम्मद की आवाज़ में पाकिस्तान की फ़िल्म "चांद सूरज" में शामिल की गई और बहुत मशहूर हुई। फ़िल्म ज़िद्दी वाली ग़ज़ल में मतला शामिल नहीं था लेकिन पाकिस्तानी फ़िल्म में सितम ये किया गया कि उस ग़ज़ल के मतला में जज़्बी का तख़ल्लुस हटा दिया गया।
"दुनिया ने हमें छोड़ा जज़्बी हम छोड़ न दें क्यों दुनिया को" इस तरह गाया गया;
दुनिया ने हमें छोड़ा ऐ दिल हम छोड़ न दें क्यों दुनिया को
दुनिया को समझ कर बैठे हैं अब दुनिया दुनिया कौन करे
जज़्बी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में उर्दू के प्रोफ़ेसर थे। उनके एक छात्र ने उनसे अपनी आटोग्राफ बुक पर उस ग़ज़ल का मतला लिखने की फ़रमाइश की तो उन्होंने बस इतना जवाब दिया था, "यह मेरी ग़ज़ल कहां है..."

क्या आप जानते हैं?

मुश्ताक़

आज की प्रस्तुति

उर्दू कवि, फ़ारसी और संस्कृत के विद्वान, स्वतंत्रता संग्राम में शामिल रहे

हर आने जाने वाले का मुँह देखता रहा

मैं रहगुज़र पे ज़ीस्त की तन्हा खड़ा रहा

पूर्ण ग़ज़ल देखें

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जगन्नाथ आज़ाद

A Conversation With Mukta Lal || Kuchh Yaadein Kuchh Batein || Rekhta

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