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ज़ेवर का डिब्बा

प्रेमचंद

ज़ेवर का डिब्बा

प्रेमचंद

MORE BYप्रेमचंद

    स्टोरीलाइन

    ठाकुर साहब के बेटे वीरेंद्र को तीस रूपये महीना ट्यूशन के साथ चंद्र प्रकाश को रहने के लिए मुफ़्त का मकान भी मिल गया था। ठाकुर साहब उस पर काफ़ी भरोसा करते थे। घर में बेटे की शादी की बात चली तो सारी ज़िम्मेदारी चंद्र प्रकाश को ही दी गई। एक रोज़ हवेली से गहनों का डिब्बा चोरी हो गया। इसके बाद चंद्र प्रकाश ने वह मकान छोड़ दिया। मगर समस्या तो तब शुरू हुई जब उसकी बीवी को पता चला कि ज़ेवर का डिब्बा किसी और ने नहीं चंद्र प्रकाश ने ही चुराया है।

    बी.ए. पास करने के बाद चन्द्र प्रकाश को ट्यूशन करने के सिवा कुछ सूझा। उनकी माँ पहले ही मर चुकी थी। उसी साल वालिद भी चल बसे, और प्रकाश ज़िंदगी के जो शीरीं ख़्वाब देखा करता था, वो मिट्टी में मिल गये, वालिद आ’ला ओह्दे पर थे। उनकी वसातत से चन्द्र प्रकाश कोई अच्छी जगह मिलने की पूरी उम्मीद थी, मगर वो सब मंसूबे धरे ही रह गये। और अब गुज़र-औक़ात के लिए सिर्फ़ तीस रुपये माहवार की ट्यूशन ही रह गई है। वालिद ने कोई जायदाद छोड़ी उल्टा भूक का बोझ और सर पर लाद दिया। और बीवी भी मिली तो ता’लीम-याफ़्ता, शौक़ीन, ज़बान की तर्रार जिसे मोटा खाने और मोटे पहनने की निस्बत मर जाना क़ुबूल था। चन्द्र प्रकाश को तीस की नौकरी करते शर्म आती थी। लेकिन ठाकुर साहब ने रहने के लिए मकान देकर उनके आँसू पोंछ दिये। ये मकान ठाकुर साहब के मकान से मिला हुआ था, पुख़्ता हवा-दार साफ़-सुथरा और ज़रूरी सामान से आरास्ता, ऐसा माकन बीस रुपये माहवार से कम में मोल सकता था। लड़का तो लगभग उन्हीं की उ’म्र का था। मगर बड़ा कुंद ज़ेह्न, काम चोर, अभी नौवीं दर्जे में पढ़ता था। सबसे बड़ी बात ये कि ठाकुर और ठकुराइन दोनों प्रकाश की बड़ी इ’ज़्ज़त करते थे, बल्कि अपना ही लड़का समझते थे। गोया मुलाज़िम नहीं, घर का आदमी था, और घर के हर एक मुआ’मले में उससे मशविरा लिया जाता था।

    2

    शाम का वक़्त था, प्रकाश ने अपने शागिर्द वीरेंद्र को पढ़ाकर चलने के लिए छड़ी उठाई तो ठकुराइन ने कहा, “अभी जाओ बेटा, ज़रा मेरे साथ आओ, तुमसे कुछ कहना है।”

    प्रकाश ने दिल में सोचा, वो क्या बात है जो वीरेंद्र के सामने नहीं कही जा सकती। प्रकाश को अलाहदा ले जा कर उमा देवी ने कहा, “तुम्हारी क्या सलाह है? वीरू का ब्याह कर दूँ एक बहुत अच्छे घर का पैग़ाम आया है।”

    प्रकाश ने मुस्कुरा कर कहा, “ये तो वीरू बाबू ही से पूछिये।”

    “नहीं मैं तुमसे पूछती हूँ।”

    प्रकाश ने ज़रा तज़बज़ुब से कहा, “मैं इस मुआ’मले में क्या सलाह दे सकता हूँ? उनका बीसवाँ साल तो है। लेकिन ये समझ लीजिए कि ब्याह के बाद पढ़ना हो चुका।”

    “तो अभी करूँ, तुम्हारी यही सलाह है।”

    “जैसा आप मुनासिब ख़याल फ़रमाएँ, मैं ने तो दोनों बातें अ’र्ज़ कर दीं।”

    “तो कर डालूं? मुझे ये डर लगता है कि लड़का कहीं बहक जाए फिर पछताना पड़ेगा।”

    “मेरे रहते हुए तो आप उसकी फ़िक्र करें। हाँ मर्ज़ी हो तो कर डालिए कोई हर्ज भी नहीं है।”

    “सब तय्यारियाँ तुम्हें करनी पड़ेंगी ये समझ लो।”

    “तो मैं कब इनकार करता हूँ।”

    रोटी की ख़ैर मनाने वाले ता’लीम-याफ़्ता नौजवानों में एक कमज़ोरी होती है, जो उन्हें तल्ख़ सच्चाई के इज़हार से रोकती है। प्रकाश में भी यही कमज़ोरी थी।

    बात पक्की हो गई और शादी का सामान होने लगा। ठाकुर साहब उन अस्हाब में से थे जिन्हें अपने ऊपर भरोसा नहीं होता। उनकी निगाह में प्रकाश की डिग्री अपने साठ साला तजर्बे से ज़्यादा कीमती थी। शादी का सारा इन्तिज़ाम प्रकाश के हाथों में था, दस बारह हज़ार रुपये से ज़्यादा क़ीमती थी। शादी का सारा इंतिज़ाम प्रकाश के हाथों में था, दस बारह हज़ार रुपये ख़र्च करने का इख़्तियार कुछ थोड़ी इज़्ज़त की बात नहीं थी, देखते-देखते एक ख़स्ता-हाल नौजवान ज़िम्मेदार मैनेजर बन बैठा। कहीं बज़ाज़ उसे सलाम करने आया है। कहीं मोहल्ले का बनिया घेरे हुए है। कहीं गैस और शामियाने वाला ख़ुशामद कर रहा है। वो चाहता तो दो चार सौ रुपये आसानी से उड़ा सकता था, लेकिन इतना कमीना था। फिर उसके साथ क्या दग़ा करे जिसने सब कुछ उसी पर छोड़ दिया हो। मगर जिस दिन उसने पाँच हज़ार के जे़वरात ख़रीदे उसके कलेजे पर साँप लोटने लगा।

    घर कर चम्पा से बोला, “हम तो यहाँ रोटियों के मोहताज हैं, और दुनिया में ऐसे ऐसे आदमी पड़े हैं जो हज़ारों लाखों रुपये के जे़वरात बनवा डालते हैं। ठाकुर साहब ने आज बहू के चढ़ावे के लिए पाँच हज़ार के ज़ेवर ख़रीदे। ऐसी ऐसी चीज़ों को देखकर आँखें ठंडी हो जाएँ सच कहता हूँ, बा’ज़ चीज़ों पर तो आँख नहीं ठहरती थी।”

    चम्पा हासिदाना लहजे में बोली, “उंह हमें क्या करना है। जिन्हें ईश्वर ने दिया है वो पहनें यहाँ तो रो रो कर मरने को पैदा हुए हैं।”

    चन्द्र प्रकाश, “यही लोग मज़े उड़ाते हैं, कमाना धमाना बाप दादा छोड़ गये हैं। मज़े से खाते और चैन करते हैं। इसीलिए कहता हूँ, ईश्वर बड़ा ग़ैर मुन्सिफ़ है।”

    चम्पा, “अपना अपना मुक़द्दर है। ईश्वर का क्या क़ुसूर है। तुम्हारे बाप-दादा छोड़ गये होते तो तुम भी मज़े उड़ाते। यहाँ तो रोज़मर्रा का ख़र्च चलाना मुश्किल है, गहने कपड़े कौन रोये? कोई ढंग की साड़ी भी नहीं कि किसी भले आदमी के घर जाना हो तो पहन लूँ। मैं तो इसी सोच में हूँ कि ठकुराइन के यहाँ शादी में कैसे जाऊँगी। सोचती हूँ बीमार पड़ जाती तो जान बचती।”

    ये कहते-कहते उसकी आँखें भर आईं, प्रकाश ने तसल्ली दी, “साड़ी तुम्हारे लिए ज़रूर लाऊँगा, ये मुसीबत के दिन हमेशा रहेंगे, ज़िंदा रहा तो एक दिन तुम सर से पाँव तक ज़ेवर से लदी होगी।”

    चम्पा मुस्कराकर बोली, “चलो ऐसी मन की मिठाई मैं नहीं खाती, गुज़र होती जाये यही बहुत है।”

    प्रकाश ने चम्पा की बात सुनकर शर्म और हया से सर झुका लिया। चम्पा उसे इतना काहिल-उल-वुजूद समझती है।

    3

    रात को दोनों खाना खा कर सोये तो प्रकाश ने फिर ज़ेवरों का ज़िक्र छेड़ा। ज़ेवर उसकी आँखों में बसे हुए थे, “इस शहर में ऐसे बढ़िया ज़ेवर बनते हैं। मुझे इसकी उम्मीद थी।”

    चम्पा ने कहा, “कोई और बात करो, ज़ेवरों की बात सुनकर दिल जलता है।”

    “ऐसी चीज़ें तुम पहनो तो रानी मालूम होने लगो।”

    “ज़ेवरों से क्या ख़ूबसूरती मा’लूम होती है, मैंने तो ऐसी बहुत सी औरतें देखी हैं, जो ज़ेवर पहन कर भी भद्दी मा’लूम होती है।”

    ठाकुर साहब... मतलब के यार मालूम होते हैं, ये हवा कि कहते,

    “तुम इस में से कोई चम्पा के लिए लेते जाओ।”

    “तुम कैसी बच्चों की सी बातें करते हो।”

    “इसमें बचपन की क्या बात है कोई फ़राख़-दिल आदमी कभी इतनी कंजूसी करता।”

    “मैं ने सख़ी कोई नहीं देखा, जो अपनी बहू के ज़ेवर किसी ग़ैर को बख़्श दे।”

    “मैं ग़ैर नहीं हूँ, हम दोनों एक ही मकान में रहते हैं, मैं उनके लड़के को पढ़ाता हूँ और शादी का सारा इंतिज़ाम कर रहा हूँ, अगर सौ दो सौ की चीज़ दे देते तो कौन सी बड़ी बात थी। मगर अहल-ए-सर्वत का दिल दौलत के बोझ से दब कर सिकुड़ जाता है। इसमें सख़ावत और फ़राख़ हौसलगी के लिए जगह ही नहीं रहती।”

    यकायक प्रकाश चारपाई से उठकर खड़ा हुआ। आह चम्पा के नाज़ुक जिस्म पर एक गहना भी नहीं फिर भी वो कितनी शाकिर है। उसे चम्पा पर रहम गया। यही तो खाने पीने की उ’म्र है और इस उ’म्र में इस बेचारी को हर एक चीज़ के लिए तरसना पड़ता है। वो दबे पाँव घर से बाहर छत पर आया। ठाकुर साहब की छत उस छत से मिली हुई थी। बीच में एक पाँच फुट ऊंची दीवार थी। वो दीवार पर चढ़ गया और ठाकुर साहब की छत पर आहिस्ता से उतर गया, घर में बिल्कुल सन्नाटा था।

    उसने सोचा पहले ज़ीने से उतर कर कमरे में चलूं, अगर वह जाग गये तो ज़ोर से हंस दूँगा और कहूँगा, क्या चरका दिया। कह दूँगा। मेरे घर की छत से कोई आदमी इधर आता दिखाई दिया इसलिए मैं भी उस के पीछे पीछे आया कि देखूं ये क्या कर रहा है? किसी को मुझ पर शक ही नहीं होगा। अगर संदूक़ की कुंजी मिल गई तो पौ बारह हैं। सब नौकरों पर शुबहा करेंगे। मैं भी कहूँगा साहब नौकरों की हरकत है उनके सिवा और कौन ले जा सकता है, मैं नलवा निकल जाऊँगा। शादी के बाद कोई दूसरा घर ले लूँगा। फिर आहिस्ता-आहिस्ता एक एक ज़ेवर चम्पा को दूँगा जिससे कोई शक गुज़रे। फिर भी वो जब ज़ीने से उतरने लगा तो उसका दिल धड़क रहा था।

    4

    धूप निकल आई थी प्रकाश अभी सो रहा था कि चम्पा ने उसे जगा कर कहा, “बड़ा ग़ज़ब हो गया रात को ठाकुर साहब के घर में चोरी हो गई, चोर ज़ेवरों का डिब्बा उठा कर ले गये।”

    प्रकाश ने पड़े पड़े पूछा, “किसी ने पकड़ा नहीं चोर को।”

    “किसी को ख़बर भी नहीं, वही डिब्बे ले गये जिसमें शादी के ज़ेवर रखे थे जाने कैसे चाबी उड़ा ली। और उन्हें कैसे मा’लूम हुआ कि इस संदूक़ में डिब्बा रखा है।”

    “नौकरों की कारस्तानी होगी, बाहर के आदमी का ये काम नहीं है।”

    “नौकर तो उनके तीनों पुराने हैं।”

    “नियत बदलते क्या देर लगती है, आज मौक़ा देखा उड़ा ले गये।”

    “तुम जा कर उनको तसल्ली दो ठकुराइन बे-चारी रो रही थी। तुम्हारा नाम लेकर कहती थीं कि बेचारा महीनों इन ज़ेवरों के लिए दौड़ा। एक एक चीज़ अपने सामने बनवाई और चोर मूँडी काटे ने उसकी सारी मेहनत पर पानी फेर दिया।”

    प्रकाश झटपट उठ बैठा और घबराया हुआ सा जाकर ठकुराइन से बोला, “यह तो बड़ा ग़ज़ब हो गया माताजी, मुझे तो अभी अभी चम्पा ने बतलाया।”

    ठाकुर साहब सर पर हाथ रखे हुए बैठे थे, बोले, “कहीं सेंध नहीं कोई ताला नहीं टूटा, किसी दरवाज़े की चूल नहीं उतरी समझ में नहीं आया कि चोर किधर से आया?”

    ठकुराइन ने रो कर कहा, “मैं तो लुट गई भय्या! ब्याह सर पर है, क्या होगा, भगवान तुमने कितनी दौड़ धूप की थी, तब कहीं जा कर चीज़ें तय्यार हो कर आई थीं जाने किस मनहूस साअ’त में बनवाई थीं।”

    प्रकाश ने ठाकुर साहब की कान में कहा, “मुझे तो नौकरों की शरारत मा’लूम होती है।”

    ठकुराइन ने मुख़ालिफ़त की, “अरे नहीं भय्या। नौकरों में कोई नहीं। दस हज़ार रुपये यूँ ही ऊपर रखे रहते हैं। कभी एक पाई का नुक़्सान नहीं हुआ।”

    ठाकुर साहब ने नाक सिकोड़ कर कहा, “तुम क्या जानो आदमी का दिल कितनी जल्दी बदल जाता है। जिसने अभी तक चोरी नहीं की वो चोरी नहीं करेगा, ये कोई नहीं कह सकता। मैं पुलिस में रिपोर्ट करूँगा और एक एक नौकर की तलाशी कराऊँगा। कहीं माल उड़ा दिया होगा। जब पुलिस के जूते पड़ेंगे तो आप इक़बाल करेंगे।”

    प्रकाश ने पुलिस का घर में आना ख़तरनाक समझा। कहीं उनके घर की तलाशी लें तो सितम ही हो जायेगा। बोले, “पुलिस में रिपोर्ट करना और तहक़ीक़ात करना बिल्कुल बेफ़ायदा है।”

    ठाकुर साहब ने मुँह बना कर कहा, “तुम भी क्या बच्चों की सी बात कर रहे हो प्रकाश बाबू। भला चोरी करने वाला ख़ुद बख़ुद इक़बाल करेगा। तुम ज़द-ओ-कूब भी नहीं कर सकते, हाँ पुलिस में रिपोर्ट करना मुझे भी फ़ुज़ूल मा’लूम होता है, माल चला गया, अब क्या मिलेगा।”

    प्रकाश, “लेकिन कुछ कुछ तो करना ही पड़ेगा।”

    ठाकुर, “कोई फ़ायदा नहीं, हाँ अगर कोई ख़ुफ़िया पुलिस का आदमी हो जो चुपके पता लगा दे तो अलबत्ता माल निकल आये। लेकिन यहाँ ऐसे आदमी कहाँ, नसीबों को रो कर बैठ रहो और क्या।”

    प्रकाश, “आप बैठे रहिए, लेकिन मैं बैठने वाला नहीं। मैं इन्हीं नौकरों के सामने चोर का नाम निकलवाउँगा।”

    ठकुराइन: “नौकरों पर मुझे पूरा यक़ीन है। किसी का नाम भी निकल आये तो मुझे यही ख़याल रहेगा कि ये किसी बाहर के आदमी का काम है। चाहे जिधर से आया हो पर चोर आया बाहर से तुम्हारे कोठे से भी तो सकता है।”

    ठाकुर: “हाँ ज़रा अपने कोठे पर देखो शायद कुछ निशान मिले। कल दरवाज़ा तो खुला हुआ नहीं रह गया?”

    प्रकाश का दिल धड़कने लगा, “बोला मैं तो दस बजे दरवाज़ा बंद कर लेता हूँ, हाँ कोई पहले से मौक़ा पा कर कोठे पर चला गया हो। वहाँ छुपा बैठा रहा हो तो दूसरी बात है।”

    तीनों आदमी छत पर गये, तो बीच की मुंडेर पर किसी के पाँव के निशान दिखाई दिये जहां प्रकाश का पाँव पड़ा था, वहां का चूना लग जाने से छत पर पाँव का निशान पड़ गया था। प्रकाश की छत पर जा कर मुंडेर की दूसरी तरफ़ देखा तो वैसे ही निशान वहाँ भी दिखाई दिये। ठाकुर साहब सर झुकाए खड़े थे। लिहाज़ के मारे कुछ कह सके थे।