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हज-ए-अक्बर

प्रेमचंद

हज-ए-अक्बर

प्रेमचंद

MORE BYप्रेमचंद

    1

    मुंशी साबिर हुसैन की आमदनी कम थी और ख़र्च ज़्यादा। अपने बच्चे के लिए दाया रखना गवारा नहीं कर सकते थे। लेकिन एक तो बच्चे की सेहत की फ़िक्र और दूसरे अपने बराबर वालों से हेटे बन कर रहने की ज़िल्लत इस ख़र्च को बर्दाश्त करने पर मजबूर करती थी। बच्चा दाया को बहुत चाहता था। हर दम उसके गले का हार बना रहता। इस वजह से दाया और भी ज़रूरी मालूम होती थी। मगर शायद सबसे बड़ा सबब ये था कि वो मुरव्वत के बाइस दाया को जवाब देने की जुर्अत कर सकते थे। बुढ़िया उनके यहाँ तीन साल से नौकर थी। उसने उनके इकलौते बच्चे की परवरिश की थी। अपना काम दिल-ओ-जान से करती थी। उसे निकालने का कोई हीला था और ख़्वाह मख़्वाह खच्चड़ निकालना साबिर जैसे हलीम शख़्स के लिए ग़ैर मुम्किन था। मगर शाकिरा इस मुआ’मले में अपने शौहर से मुत्तफ़िक़ थी उसे शक था कि दाया हमको लूटे लेती है। जब दाया बाज़ार से लौटती तो वह दहलीज़ में छुपी रहती कि देखूँ आटा छुपा कर तो नहीं रख देती। लकड़ी तो नहीं छुपा देती। उसकी लाई हुई चीज़ को घंटों देखती, पछताती, बार-बार पूछती इतना ही क्यूँ? क्या भाव है? क्या इतना महंगा हो गया? दाया कभी तो उन बद-गुमानियों का जवाब मुलाइमत से देती। लेकिन जब बेगम ज़्यादा तेज़ हो जातीं, तो वह भी कड़ी पड़ जाती थी। क़समें खाती। सफ़ाई की शहादतें पेश करती। तर्दीद और हुज्जत में घंटों लग जाते। क़रीब क़रीब रोज़ाना यही कैफ़ियत रहती थी और रोज़ ये ड्रामा दाया की ख़फ़ीफ़ सी अश्क रेज़ी के बाद ख़त्म हो जाता था। दाया का इतनी सख़्तियाँ झेल कर पड़े रहना शाकिरा के शुकूक की आब रेज़ी करता था। उसे कभी यक़ीन आता था कि ये बुढ़िया महज़ बच्चे की मोहब्बत से पड़ी हुई है। वो दाया को ऐसे लतीफ़ जज़्बे का अह्ल नहीं समझती थी।

    2

    इत्तिफ़ाक़ से एक रोज़ दाया को बाज़ार से लौटने में ज़रा देर हो गई। वहाँ दो कुंजड़िनों में बड़े जोश-ओ-ख़रोश से मुनाज़िरा था। उनका मुसव्विर तर्ज़-ए-अदा। उनका इश्तिआ’ल अंगेज़ इस्तिदलाल। उनकी मुतशक्किल तज़हीक। उनकी रौशन शहादतें और मुनव्वर रिवायतें उनकी तअ’रीज़ और तर्दीद सब बेमिसाल थीं। ज़हर के दो दरिया थे। या दो शो’ले जो दोनों तरफ़ से उमड कर बाहम गुथ गए थे। क्या रवानी थी। गोया कूज़े में दरिया भरा हुआ। उनका जोश-ए-इज़हार एक दूसरे के बयानात को सुनने की इजाज़त देता था। उनके अलफ़ाज़ की ऐसी रंगीनी तख़य्युल की ऐसी नौइयत। उस्लूब की ऐसी जिद्दत। मज़ामीन की ऐसी आमद। तशबीहात की ऐसी मौज़ूनियत। और फ़िक्र की ऐसी परवाज़ पर ऐसा कौन सा शायर है जो रश्क करता। सिफ़त ये थी कि इस मुबाहिसे में तल्ख़ी या दिल आज़ारी का शाइबा भी था। दोनों बुलबुलें अपने अपने तरानों में मह्व थीं। उनकी मतानत, उनका ज़ब्त, उनका इत्मिनान-ए-क़ल्ब हैरत-अंगेज़ था उनके ज़र्फ़-ए-दिल में इससे कहीं ज़्यादा कहने की और ब-दरजहा ज़्यादा सुनने की गुंजाइश मालूम होती थी। अल-ग़रज़ ये ख़ालिस दिमाग़ी, ज़ेह्नी मुनाज़िरा था। अपने अपने कमालात के इज़हार के लिए, एक ख़ालिस ज़ोर आज़माई थी अपने अपने करतब और फ़न के जौहर दिखाने के लिए।

    तमाशाइयों का हुजूम था। वो मुब्ताज़िल किनायात-ओ-इशारे जिन पर बेशर्मी को शर्म आती। वो कलिमात रकीक जिनसे अ’फ़ूनत भी दूर भागती। हज़ारों रंगीन मिज़ाजों के लिए महज़ बाइस-ए-तफ़रीह थे।

    दाया भी खड़ी हो गई कि देखूँ क्या माजरा है। पर तमाशा इतना दिल आवेज़ था कि उसे वक़्त का मुतलक़ एहसास हुआ। यका य़क नौ बजने की आवाज़ कान में आई तो सहर टूटा। वो लपकी हुई घर की तरफ़ चली।

    शाकिरा भरी बैठी थी। दाया को देखते ही तेवर बदल कर बोली, क्या बाज़ार में खो गई थीं? दाया ने ख़ता-वाराना अंदाज़ से सर झुका लिया। और बोली, “बीवी एक जान पहनचान की मामा से मुलाक़ात हो गई। और बातें करने लगी।”

    शाकिरा जवाब से और भी बरहम हुई। यहाँ दफ़्तर जाने को देर हो रही है तुम्हें सैर सपाटे की सूझी है। मगर दाया ने इस वक़्त दबने में ख़ैरियत समझी। बच्चे को गोद में लेने चली पर शाकिरा ने झिड़क कर कहा, “रहने दो। तुम्हारे बग़ैर बेहाल नहीं हुआ जाता।”

    दाया ने इस हुक्म की तामील ज़रूरी समझी। बेगम साहिबा का ग़ुस्सा फ़िरौ करने की इससे ज़्यादा कारगर कोई तदबीर ज़ेह्न में आई। उसने नसीर को इशारे से अपनी तरफ़ बुलाया। वो दोनों हाथ फैलाए लड़खड़ाता हुआ उसकी तरफ़ चला। दाया ने उसे गोद में उठा लिया। और दरवाज़े की तरफ़ चली। लेकिन शाकिरा बाज़ की तरह झपटी और नसीर को उस की गोद से छीन कर बोली, “तुम्हारा ये मकर बहुत दिनों से देख रही हूँ। ये तमाशे किसी और को दिखाइए। यहाँ तबीअ’त सैर हो गई।”

    दाया नसीर पर जान देती और समझती थी कि शाकिरा उससे बे-ख़बर नहीं है उसकी समझ में शाकिरा और उसके दरमियान ये ऐसा मज़बूत तअ’ल्लुक़ था जिसे मा’मूली तुर्शियाँ कमज़ोर कर सकती थीं। इसी वजह से बावजूद शाकिरा की सख़्त ज़बानियों के उसे यक़ीन आता था कि वो वाक़ई मुझे निकालने पर आमादा है। पर शाकिरा ने ये बातें कुछ इस बेरुख़ी से कीं और बिलख़ुसूस नसीर को इस बेदर्दी से छीन लिया कि दाया से ज़ब्त हो सका। बोली, “बीवी मुझसे कोई ऐसी बड़ी ख़ता तो नहीं हुई। बहुत होगा तो पाव घंटे की देर हुई होगी। इस पर आप इतना झल्ला रही हैं। साफ़-साफ़ क्यूँ नहीं कह देतीं कि दूसरा दरवाज़ा देखो। अल्लाह ने पैदा किया है तो रिज़्क़ भी देगा। मज़दूरी का काल थोड़ा ही है।”

    शाकिरा: “तो यहाँ तुम्हारी कौन परवा करता है। तुम्हारी जैसी मामाएँ गली गली ठोकरें खाती फिरती हैं।”

    दाया: “हाँ ख़ुदा आपको सलामत रखे। मामाएं दाइयाँ बहुत मिलेंगी। जो कुछ ख़ता हुई हो। माफ़ कीजिएगा। मैं जाती हूँ।”

    शाकिरा: “जा कर मरदाने में अपनी तनख़्वाह का हिसाब करलो।”

    दाया: “मेरी तरफ़ से नसीर मियाँ को उसकी मिठाइयाँ मंगवा दीजिएगा।”

    इतने में साबिर हुसैन भी बाहर से गए, “पूछा क्या है?”

    दाया: “कुछ नहीं। बीवी ने जवाब दे दिया है। घर जाती हूँ।”

    साबिर हुसैन ख़ानगी तरद्दुदात से यूँ बचते थे। जैसे कोई बरहना-पा कांटों से बचे। उन्हें सारे दिन एक ही जगह खड़े रहना मंज़ूर था। पर कांटों में पैर रखने की जुर्रत थी। चीं जबीं हो कर बोले, “बात क्या हुई?”

    शाकिरा: “कुछ नहीं। अपनी तबीअ’त। नहीं जी चाहता नहीं रखते। किसी के हाथों बिक तो नहीं गए।”

    साबिर: “तुम्हें बैठे बिठाए एक एक एक खिचड़ी सूझती रहती है।”

    शाकिरा: “हाँ, मुझे तो इस बात का जुनून है। क्या करूँ ख़सलत ही ऐसी है, तुम्हें ये बहुत प्यारी है तो ले जा कर गले बाँधो! मेरे यहाँ ज़रूरत नहीं है।”

    दाया घर से निकली। तो उस की आँखें लबरेज़ थीं। दिल नसीर के लिए तड़प रहा था कि एक बार बच्चे को गोद में लेकर प्यार करलूँ। पर ये हसरत लिए उसे घर से निकलना पड़ा।

    3

    नसीर दाया के पीछे पीछे दरवाज़े तक आया। लेकिन जब दाया ने दरवाज़ा बाहर से बंद कर दिया तो मचल कर ज़मीन पर लेट गया। और अन्ना अन्ना कह कर रोने लगा। शाकिरा ने चुमकारा। प्यार किया, गोद में लेने की कोशिश की। मिठाई का लालच दिया। मेला दिखाने का वअ’दा किया। उससे काम चला तो बंदर और सिपाही और लोलो और हवा की धमकी दी। पर नसीर पर मुतलक़ असर हुआ। यहाँ तक की शाकिरा को गुस्सा आगया। उसने बच्चे को वहीँ छोड़ दिया और घर कर घर के धंदों में मस्रूफ़ हो गई नसीर का मुँह और गाल लाल हो गए। आँखें सूज गईं। आख़िर वो वहीं ज़मीन पर सिसकते सिसकते सो गया।

    शाकिरा ने समझा था थोड़ी देर में बच्चा रो-धो कर चुप हो जाएगा। पर नसीर ने जागते ही फिर अन्ना की रट लगाई। तीन बजे साबिर हुसैन दफ़्तर से आए और बच्चे की ये हालत देखी तो बीवी की तरफ़ क़हर की निगाहों से देखकर उसे गोद में उठा लिया और बहलाने लगे। आख़िर नसीर को जब यक़ीन हो गया कि दाया मिठाई लेने गई है तो उसे तस्कीन हुई। मगर शाम होते ही उसने फिर चीख़ना शुरू किया। “अन्ना मिठाई लाई?”

    इस तरह दो तीन दिन गुज़र गए। नसीर को अन्ना की रट लगाने और रोने के सिवा और कोई काम था। वो बे-ज़रर कुत्ता जो एक लम्हे के लिए उसकी गोद से जुदा होता था। वो बेज़बान बिल्ली जिसे ताक़ पर बैठे देखकर वो ख़ुशी से फूले समाता था। वो ताइर-ए-बे-परवाज़ जिस पर वो जान देता था। सब उस की नज़रों से गिर गए। वो उनकी तरफ़ आँख उठा कर भी देखता। अन्ना जैसी जीती जागती प्यार करने वाली, गोद में लेकर घुमाने वाली, थपक-थपक कर सुलाने वाली, गा-गा कर ख़ुश करने वाली चीज़ की जगह उन बे-जान, बे-ज़ुबान चीज़ों से पुर हो सकती थी। वो अक्सर सोते-सोते चौंक पड़ता। और अन्ना अन्ना पुकार कर रोने लगता। कभी दरवाज़े पर जाता और अन्ना अन्ना पुकार कर हाथों से इशारा करता। गोया उसे बुला रहा है। अन्ना की ख़ाली कोठरी में जा कर घंटो बैठा रहता। उसे उम्मीद होती थी कि अन्ना यहाँ आती होगी। उस कोठरी का दरवाज़ा बंद पाता तो जा कर किवाड़ खटखटाता कि शायद अन्ना अंदर छुपी बैठी हो। सदर दरवाज़ा खुलते सुनता तो अन्ना अन्ना कह कर दौड़ता। समझता कि अन्ना गई। उसका गदराया हुआ बदन घुल गया। गुलाब के से रुख़्सार सूख गए। माँ और बाप दोनों उसकी मोहिनी हंसी के लिए तरस तरस कर रह जाते। अगर बहुत गुदगुदाने और छेड़ने से हँसता भी तो ऐसा मालूम होता दिल से नहीं महज़ दिल रखने के लिए हंस रहा है। उसे अब दूध से रग़्बत थी मिस्री से। मेवे से मीठे बिस्कुट से। ताज़ी इमर्तियों से, उनमें मज़ा था जब अन्ना अपने हाथों से खिलाती थी। अब उनमें मज़ा था। दो साल का होनहार लहलहाता हुआ शादाब पौदा मुरझा कर रह गया। वो लड़का जिसे गोद में उठाते ही नर्मी गर्मी और ज़बान का एहसास होता था। अब इस्तिख़्वाँ एक पुतला रह गया था। शाकिरा बच्चे की ये हालत देख देखकर अंदर ही अंदर कुढ़ती और अपनी हिमाक़त पर पछताती। साबिर हुसैन जो फ़ित्रतन ख़लवत पसंद आदमी थे अब नसीर को गोद से जुदा करते थे। उसे रोज़ हवा खिलाने जाते। नित-नए खिलौने लाते। पर मुरझाया हुआ पौदा किसी तरह पनपता था। दाया उसकी दुनिया का आफ़ताब थी। उस क़ुदरती हरारत और रौशनी से महरूम हो कर सब्ज़ी की बहार क्यूँ कर दिखाता? दाया के बग़ैर चारों तरफ़ अंधेरा सन्नाटा नज़र आता, दूसरी अन्ना तीसरे ही दिन रख ली थी। पर नसीर उसकी सूरत देखते ही मुँह छुपा लेता था। गोया वो कोई देवनी या भूतनी है।

    आ’लम-ए-वुजूद में दाया को देखकर नसीर अब ज़्यादा-तर आ’लम-ए-ख़याल में रहता। वहाँ उसकी अपनी अन्ना चलती फिरती नज़र आती थी। उसकी वही गोद थी। वही मोहब्बत। वही प्यारी बातें। वही प्यारे प्यारे गीत। वही मज़ेदार मिठाइयाँ। वही सुहाना संसार, वही दिलकश लैल-ओ-नहार। अकेले बैठे अन्ना से बातें करता। अन्ना कुत्ता भौंके, अन्ना गाय दूध देती। अन्ना उजला उजला घोड़ा दौड़ता। सवेरा होते ही लोटा लेकर दाया की कोठड़ी में जाता, और कहता, “अन्ना पानी पी” दूध का गिलास लेकर उसकी कोठड़ी में रख आता और कहता, “अन्ना दूध पिला।” अपनी चारपाई पर तकिया रखकर चादर से ढांक देता और कहता, “अन्ना सोती।” शाकिरा खाने बैठती तो रिकाबियाँ उठा उठा अन्ना की कोठड़ी में ले जाता और कहता, “अन्ना खाना खाएगी।” अन्ना उसके लिए अब एक आसमानी वुजूद थी जिसकी वापसी की उसे मुतलक़ उम्मीद थी। वो महज़ गुज़श्ता ख़ुशियों की दिलकश यादगार थी। जिसकी याद ही उसका सब कुछ थी। नसीर के अंदाज़ में रफ़्ता रफ़्ता तिफ़्लाना शोख़ी और बे-ताबी की जगह एक हसरतनाक तवक्कल, एक मायूसाना ख़ुशी नज़र आने लगी। इस तरह तीन हफ़्ते गुज़र गए। बरसात का मौसम था। कभी शिद्दत की गर्मी, कभी हवा के ठंडे झोंके। बुख़ार और ज़ुकाम का ज़ोर था। नसीर की नहाफ़त इन मौसमी तग़य्युरात को बर्दाश्त कर सकी। शाकिरा, एहतियातन उसे फ़लालैन का कुर्ता पहनाए रखती। उसे पानी के क़रीब जाने देती, नंगे पाँव एक क़दम चलने देती। मगर रुतूबत का असर हो ही गया। नसीर खांसी में मुब्तिला हो गया।

    4

    सुब्ह का वक़्त था। नसीर चारपाई पर आँखें बंद किए पड़ा होता। डाक्टरों का इलाज बेसूद रहा था। शाकिरा चारपाई पर बैठी उसके सीने पर तेल की मालीश कर रही थी। और साबिर हुसैन सूरत-ए-ग़म बने हुए बच्चे को पुरदर्द निगाहों से देख रहे थे। इस तरफ़ वो शाकिरा से बहुत कम बोलते थे। उन्हें उससे एक नफ़रत सी होती थी। वो नसीर की इस बीमारी का सारा इल्ज़ाम उसी के सर रखते थे। वो उनकी निगाहों में निहायत कमज़र्फ़ सुफ़्ला मिज़ाज बेहिस औरत थी।

    शाकिरा ने डरते-डरते कहा, “आज बड़े हकीम साहब को बुला लेते। शायद उन्हीं की दवा से फ़ायदा हो।”

    साबिर हुसैन ने काली घटाओं की तरफ़ देखकर तुर्शी से जवाब दिया, “बड़े हकीम नहीं। लुक़्मान भी आएँ तो इसे कोई फ़ायदा हो।”

    शकिरा: “तो क्या अब किसी की दवा ही होगी?”

    साबिर: “बस उसकी एक ही दवा है और वो नायाब है।”

    शाकिरा: “तुम्हें तो वही धुन सवार है। क्या अब्बासी अमृत पिला देगी?”

    साबिर: “हाँ वो तुम्हारे लिए तो चाहे ज़हर हो लेकिन बच्चे के लिए अमृत ही होगी।”

    शाकिरा: “मैं नहीं समझती कि अल्लाह की मर्ज़ी में उसे इतना दख़ल है।”

    साबिर: “अगर नहीं समझती हो और अब तक नहीं समझा तो रोओगी। बच्चे से हाथ धोना पड़ेगा।”

    शाकिरा: “चुप भी रहो। कैसा शगुन ज़बान से निकालते हो। अगर ऐसी जली-कटी सुनानी हैं तो यहाँ से चले जाओ।”

    साबिर: “हाँ तो मैं जाता हूँ। मगर याद रक्खो ये ख़ून तुम्हारी गर्दन पर होगा। अगर लड़के को फिर तंदुरुस्त देखना चाहती हो तो उसी अब्बासी के पास जाओ। उसकी मिन्नत करो। इल्तिजा करो। तुम्हारे बच्चे की जान उसी के रहम पर मुनहसिर है।”

    शाकिरा ने कुछ जवाब दिया। उसकी आँखों से आँसू जारी थे।

    साबिर हुसैन ने पूछा, “क्या मर्ज़ी है। जाऊँ उसे तलाश करूँ?”

    शाकिरा: “तुम क्यूँ जाओगे। मैं ख़ुद चली जाऊँगी।”

    साबिर: “नहीं, माफ़ करो। मुझे तुम्हारे ऊपर ए’तिबार नहीं है। जाने तुम्हारे मुँह से क्या निकल जाए कि वो आती भी हो तो आए।”

    शाकिरा ने शौहर की तरफ़ निगाह-ए-मलामत से देखकर कहा, “हाँ और क्या। मुझे अपने बच्चे की बीमारी का क़लक़ थोड़े ही है। मैं ने शर्म के मारे तुमसे कहा नहीं लेकिन मेरे दिल में बार-बार ये ख़याल पैदा हुआ है अगर मुझे दाया के मकान का पता मा’लूम होता तो मैं उसे कब की मना लाई होती। वो मुझ से कितनी ही नाराज़ हो लेकिन नसीर से उसे मोहब्बत थी। मैं आज ही उसके पास जाऊँगी। उसके क़दमों को आँसुओं से तर कर दूँगी और वो जिस तरह राज़ी होगी उसे राज़ी करूँगी।”

    शाकिरा ने बहुत ज़ब्त कर के ये बातें कहीं। मगर उमड़े हुए आँसू अब रुक सके। साबिर हुसैन ने बीवी की तरफ़ हमदर्दाना निगाह से देखा और नादिम हो कर बोले, “मैं तुम्हारा जाना मुनासिब नहीं समझता। मैं ख़ुद ही जाता हूँ।”

    5

    अब्बासी दुनिया में अकेली थी। किसी ज़माने में उसका ख़ानदान गुलाब का सर सब्ज़-शादाब दरख़्त था। मगर रफ़्ता-रफ़्ता ख़िज़ाँ ने सब पत्तियाँ गिरा दीं। बाद-ए-हवादिस ने दरख़्त को पामाल कर दिया। और अब यही सूखी टहनी हरे भरे दरख़्त की यादगार बाक़ी थी।

    मगर नसीर को पा कर उसकी सूखी टहनी में जान सी पड़ गई थी। उस में हरी पत्तियाँ निकल आई थीं। वो ज़िंदगी जो अब तक ख़ुश्क और पामाल थी उसमें फिर रंग-ओ-बू के आसार पैदा हो गए थे। अंधेरे बयाबान में भटके हुए मुसाफ़िर को शम्मा की झलक नज़र आने लगी थी। अब उसका जू-ए-हयात संग रेज़ों से टकराता था, वो अब एक गुलज़ार की आबयारी करता था। अब उसकी ज़िंदगी मोहमल नहीं थी। उसमें मअ’नी पैदा हो गए थे।

    अब्बासी नसीर की भोली बातों पर निसार हो गई। मगर वो अपनी मोहब्बत को शाकिरा से छुपाती थी। इसलिए कि माँ के दिल में रश्क हो। वो नसीर के लिए माँ से छुपकर मिठाइयाँ लाती और उसे खिला कर ख़ुश होती। वो दिन में दो-दो तीन-तीन बार उसे उबटन मलती कि बच्चा ख़ूब परवान चढ़े। वो उसे दूसरों के सामने कोई चीज़ खिलाती कि बच्चे को नज़र लग जाए। हमेशा दूसरों से बच्चे की कमख़ोरी का रोना रोया करती। उसे नज़र बद से बचाने के लिए ता’वीज़ और गंडे लाती रहती ये उसकी ख़ालिस मादराना मोहब्बत थी। जिसमें अपने रुहानी एहतिज़ाज़ के सिवा और कोई ग़रज़ थी।

    उस घर से निकल कर आज अब्बासी की वो हालत हो गई जो थिएटर में यका य़क बिजलियों के गुल हो जाने से होती है। उसकी आँखों के सामने वही सूरत नाच रही थी। कानों में वही प्यारी प्यारी बातें गूंज रही थीं। उसे अपना घर फाड़े खाता था। उस काल कोठड़ी में दम घुटा जाता था।

    रात जूँ तूँ कर के कटी। सुब्ह को वो मकान में झाड़ू दे रही थी। यका यक ताज़े हलवे की सदा सुनकर बे-इख़्तियार बाहर निकल आई। मअ’न याद गया। आज हलवा कौन खाएगा? आज गोद में बैठकर कौन चहकेगा? वो नग़्मा-ए-मसर्रत सुनने के लिए जो हलवा खाते वक़्त नसीर की आँखों से, होंटों से और जिस्म के एक एक अ’ज़ू से बरसता था। अब्बासी की रूह तड़प उठी। वो बेक़रारी के आ’लम में घर से निकली कि चलूँ नसीर को देख आऊँ। पर आधे रास्ता से लौट गई।

    नसीर अब्बासी के ध्यान से एक लम्हा के लिए भी नहीं उतरता था। वो सोते सोते चौंक पड़ती। मा’लूम होता, नसीर डंडे का घोड़ा दबाए चला आता है। पड़ोसनों के पास जाती तो नसीर ही का चर्चा करती। उसके घर कोई आता तो नसीर ही का ज़िक्र करती। नसीर उसके दिल और जान में बसा हुआ था। शाकिरा की बेरुख़ी और बदसुलूकी के मलाल के लिए उसमें जगह थी।

    वो रोज़ इरादा करती कि आज नसीर को देखने जाऊँगी। उसके लिए बाज़ार से खिलौने और मिठाइयाँ लाती। घर से चलती लेकिन कभी आधे रास्ते से लौट आती। कभी दो चार क़दम से आगे बढ़ा जाता। कौन मुँह लेकर जाऊँ? जो मोहब्बत को फ़रेब समझता हो। उसे कौन मुँह दिखाऊँ। कभी सोचती कहीं नसीर मुझे पहचाने तो बच्चों की मोहब्बत का एतिबार? नई दाया से परिच गया हो। ये ख़याल उसके पैरों पर ज़ंजीर का काम कर जाता था।

    इस तरह दो हफ़्ते गुज़र गए। अब्बासी का दिल हर दम उचाट रहता। जैसे उसे कोई लंबा सफ़र दरपेश हो। घर की चीज़ें जहाँ की तहाँ पड़ी रहतीं। खाने की फ़िक्र कपड़े की। बदनी ज़रूरियात भी ख़ला दिल को पुर करने में लगी हुई थीं। अब्बासी की हालत उस वक़्त पालतू चिड़िया की सी थी जो क़फ़स से निकल कर फिर किसी गोशे की तलाश में हो। उसे अपने तईं भुला देने का ये एक बहाना मिल गया। आमादा सफ़र हो गई।

    6

    आसमान पर काली घटाएँ छाई हुई थीं और हल्की हल्की फुवारें पड़ रही थीं। दिल्ली स्टेशन पर ज़ाइरीन का हुजूम था। कुछ गाड़ियों में बैठे थे। कुछ अपने घर वालों से रुख़्सत हो रहे थे। चारों तरफ़ एक कोहराम सा मचा हुआ था। दुनिया उस वक़्त भी जाने वालों के दामन पकड़े हुए थी। कोई बीवी से ताकीद कर रहा था। धान कट जाए तो तालाब वाले खेत में मटर बो देना और बाग़ के पास गेहूँ। कोई अपने जवान लड़के को समझा रहा था। असामियों पर बक़ाया लगान की नालिश करने में देर करना और दो रुपये सैकड़ा सूद ज़रूर मुजरा कर लेना। एक बूढ़े ताजिर साहब अपने मुनीम से कह रहे थे। माल आने में देर हो तो ख़ुद चले जाइएगा। और चलतू माल लीजिएगा वर्ना रुपया फंस जाएगा। मगर ख़ाल ख़ाल ऐसी सूरतें भी नज़र आती थीं जिन पर मज़हबी इरादात का जलवा था। वो या तो ख़ामोशी से आसमान की तरफ़ ताकती थीं या मह्व-ए-तस्बीह-ख़्वानी थीं। अब्बासी भी एक गाड़ी में बैठी सोच रही थी। इन भले आदमियों को अब भी दुनिया की फ़िक्र नहीं छोड़ती। वही