Zehra Nigaah's Photo'

पाकिस्तान की अग्रणी शायरात में विख्यात।

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ज़ेहरा निगाह

ग़ज़ल 44

शेर 48

अब इस घर की आबादी मेहमानों पर है

कोई जाए तो वक़्त गुज़र जाता है

नहीं नहीं हमें अब तेरी जुस्तुजू भी नहीं

तुझे भी भूल गए हम तिरी ख़ुशी के लिए

इस उम्मीद पे रोज़ चराग़ जलाते हैं

आने वाले बरसों ब'अद भी आते हैं

छोटी सी बात पे ख़ुश होना मुझे आता था

पर बड़ी बात पे चुप रहना तुम्ही से सीखा

कहाँ के इश्क़-ओ-मोहब्बत किधर के हिज्र विसाल

अभी तो लोग तरसते हैं ज़िंदगी के लिए

बच्चों की कहानी 1

 

पुस्तकें 6

Firaq

 

2009

हयात-ए-जमाली

भाग-001

 

Sham Ka Pahla Tara

 

1980

Sham Ka Pahla Tara

 

2012

 

चित्र शायरी 4

बैठे बैठे कैसा दिल घबरा जाता है जाने वालों का जाना याद आ जाता है बात-चीत में जिस की रवानी मसल हुई एक नाम लेते में कुछ रुक सा जाता है हँसती-बस्ती राहों का ख़ुश-बाश मुसाफ़िर रोज़ी की भट्टी का ईंधन बन जाता है दफ़्तर मंसब दोनों ज़ेहन को खा लेते हैं घर वालों की क़िस्मत में तन रह जाता है अब इस घर की आबादी मेहमानों पर है कोई आ जाए तो वक़्त गुज़र जाता है

 

वीडियो 50

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हास्य वीडियो
aaj ke din na pucho mere dosto

ज़ेहरा निगाह

taazaa hai abhi yaad mein ai saqi-e-gulfaam

ज़ेहरा निगाह

bol

बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे ज़ेहरा निगाह

do ishq

(1) ज़ेहरा निगाह

KHurshid-e-mahshar ki lau

आज के दिन न पूछो मिरे दोस्तो ज़ेहरा निगाह

ईरानी तलबा के नाम

ये कौन सख़ी हैं ज़ेहरा निगाह

क्या करें

मिरी तिरी निगाह में ज़ेहरा निगाह

किसी कली ने भी देखा न आँख भर के मुझे

ज़ेहरा निगाह

गए दिनों का सुराग़ ले कर किधर से आया किधर गया वो

ज़ेहरा निगाह

जिस रोज़ क़ज़ा आएगी

किस तरह आएगी जिस रोज़ क़ज़ा आएगी ज़ेहरा निगाह

दुआ

आइए हाथ उठाएँ हम भी ज़ेहरा निगाह

दयार-ए-दिल की रात में चराग़ सा जला गया

ज़ेहरा निगाह

दरीचा

गड़ी हैं कितनी सलीबें मिरे दरीचे में ज़ेहरा निगाह

दिल-ए-मन मुसाफ़िर-ए-मन

मिरे दिल, मिरे मुसाफ़िर ज़ेहरा निगाह

मता-ए-लौह-ओ-क़लम छिन गई तो क्या ग़म है

ज़ेहरा निगाह

ये दाग़ दाग़ उजाला ये शब-गज़ीदा सहर

ज़ेहरा निगाह

ये शब ये ख़याल-ओ-ख़्वाब तेरे

ज़ेहरा निगाह

वो बुतों ने डाले हैं वसवसे कि दिलों से ख़ौफ़-ए-ख़ुदा गया

ज़ेहरा निगाह

सुब्ह की आज जो रंगत है वो पहले तो न थी

ज़ेहरा निगाह

ऑडियो 26

अपना हर अंदाज़ आँखों को तर-ओ-ताज़ा लगा

गर्दिश-ए-मीना-ओ-जाम देखिए कब तक रहे

बस्ती में कुछ लोग निराले अब भी हैं

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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