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मैं रेत का महल हूँ मिरे पासबाँ दरख़्त

परवीन कुमार अश्क

मैं रेत का महल हूँ मिरे पासबाँ दरख़्त

परवीन कुमार अश्क

MORE BYपरवीन कुमार अश्क

    मैं रेत का महल हूँ मिरे पासबाँ दरख़्त

    सीने पे रोक लेते हैं सब आँधियाँ दरख़्त

    देखे गए थे जिस के तले दो जवाँ बदन

    लोगों ने टुकड़े टुकड़े किया वो जवाँ दरख़्त

    ढूँडेंगे अब परिंद कहाँ शाम को पनाह

    जंगल की आग खा गई सब डालियाँ दरख़्त

    फलदार था तो गाँव उसे पूजता रहा

    सूखा तो क़त्ल हो गया वो बे-ज़बाँ दरख़्त

    सूरज था दुख का सर पे कि थीं ग़म की बारिशें

    दश्त-ए-सफ़र में मेरे बने साएबाँ दरख़्त

    कैसी हवा चली है कि फिर चीख़ चीख़ कर

    सब को सुना गए हैं मिरी दास्ताँ दरख़्त

    सौ बार मेरे जिस्म को छू कर गई बहार

    फिर भी हूँ 'अश्क' सूखा हुआ नीम-जाँ दरख़्त

    स्रोत:

    Tahreek Silver Jubilee Number (Pg. 451)

    • लेखक: Gopal Mittal, Makhmoor Saeedi, Prem Gopal Mittal
      • संस्करण: July, Aug., Sep. Oct. 1978,Volume No. 26,Issue No. 4,5,6,7,
      • प्रकाशक: Monthly Tahreek, 9, Ansari Market, Daryaganj, New Delhi-110002
      • प्रकाशन वर्ष: July, Aug., Sep. Oct. 1978,Volume No. 26,Issue No. 4,5,6,7,

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