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नालों से मेरे कब तह-ओ-बाला जहाँ नहीं

मुफ़्ती सदरुद्दीन आज़ुर्दा

नालों से मेरे कब तह-ओ-बाला जहाँ नहीं

मुफ़्ती सदरुद्दीन आज़ुर्दा

MORE BYमुफ़्ती सदरुद्दीन आज़ुर्दा

    नालों से मेरे कब तह-ओ-बाला जहाँ नहीं

    कब आसमाँ ज़मीन ज़मीं आसमाँ नहीं

    आँखों से देख कर तुझे सब मानना पड़ा

    कहते थे जो हमेशा चुनीं है चुनाँ नहीं

    उस बज़्म में नहीं कोई आगाह-ए-दर्द कब

    वाँ ख़ंदा ज़ेर-ए-लब इधर अश्क-ए-निहाँ नहीं

    अफ़्सुर्दा-दिल हो दर-ए-रहमत नहीं है बंद

    किस दिन खुला हुआ दर-ए-पीर-ए-मुग़ाँ नहीं

    लब बंद हों तो रौज़न-ए-सीना को क्या करूँ

    थमता तो मुझ से नाला-ए-आतिश-इनाँ नहीं

    मिलना तिरा ये ग़ैर से हो बहर-ए-मस्लहत

    हम को तो सादगी से तिरी ये गुमाँ नहीं

    दिल तमाम नफ़अ है सौदा-ए-इश्क़ में

    इक जान का ज़ियाँ है सो ऐसा ज़ियाँ नहीं

    बे-वक़्त आए दैर में क्या शोरिशें करें

    हम पीर पीर-ए-मै-कदा भी नौजवाँ नहीं

    कटती किसी तरह से नहीं ये शब-ए-फ़िराक़

    शायद कि गर्दिश आज तुझे आसमाँ नहीं

    'आज़ुर्दा' होंट तक हिले उस के रू-ब-रू

    माना कि आप सा कोई जादू-बयाँ नहीं

    स्रोत:

    intekhab-e-zarrin (Pg. 117)

    • लेखक: Khvaja Mohammad Zakariya
      • संस्करण: 2009
      • प्रकाशक: Sangeet publication
      • प्रकाशन वर्ष: 2009

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