हर बे-ख़ता है आज ख़ता-कार देखना

इम्तियाज़ साग़र

हर बे-ख़ता है आज ख़ता-कार देखना

इम्तियाज़ साग़र

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    हर बे-ख़ता है आज ख़ता-कार देखना

    सच्चाइयों पे झूट की यलग़ार देखना

    तक़दीर बन जाए शब-ए-तार देखना

    बुझने को है चराग़ सर-ए-दार देखना

    मक़्तूल की जबीं पे है क़ातिल लिखा हुआ

    क्या फ़ैसला हो कल सर-ए-दरबार देखना

    होगा बहुत शदीद तमाज़त का इंतिक़ाम

    साए से मिल के रोएगी दीवार देखना

    इन पत्थरों के साए में रुकना फ़ुज़ूल है

    बे-बर्ग-ओ-बे-समर हैं ये कोहसार देखना

    इस शहर-ए-आरज़ू को नज़र किस की खा गई

    मक़्तल बने हैं कूचा-ओ-बाज़ार देखना

    कुछ दिन अगर ये मौसम-ए-वहशत-असर रहा

    हर आदमी को बे-दर-ओ-दीवार देखना

    देता हूँ कैसे जान सर-ए-जादा-ए-वफ़ा

    मुझ को देखना मिरा पिंदार देखना

    ख़ून-ए-जिगर से लिखता हूँ 'साग़र' मैं हर्फ़-ए-हक़

    वक़्त आए तो क़लम को भी तलवार देखना

    स्रोत :
    • पुस्तक : Nai Pakistani Ghazal Naye Dastakhat (पृष्ठ 24)
    • रचनाकार : Nishat Shahid
    • प्रकाशन : Miaar Publications K 20 C Shaikh Saraye Phase2 New Delhi (1983)
    • संस्करण : 1983

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