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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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ग़म्ज़े ने उस के चोरी में दिल की हुनर किया

मीर तक़ी मीर

ग़म्ज़े ने उस के चोरी में दिल की हुनर किया

मीर तक़ी मीर

ग़म्ज़े ने उस के चोरी में दिल की हुनर किया

उस ख़ानुमाँ-ख़राब ने आँखों में घर किया

रंग उड़ चला चमन में गुलों का तो क्या नसीम

हम को तो रोज़गार ने बे-बाल-ओ-पर किया

नाफ़े जो थीं मिज़ाज को अव्वल सो इश्क़ में

आख़िर उन्हीं दवाओं ने हम को ज़रर किया

मरता हूँ जान दें हैं वतन-दारीयों पे लोग

और सुनते जाते हैं कि हर इक ने सफ़र किया

क्या जानूँ बज़्म-ए-ऐश कि साक़ी की चश्म देख

मैं सोहबत-ए-शराब से आगे सफ़र किया

जिस दम कि तेग़-ए-इश्क़ खिंची बुल-हवस कहाँ

सुन लीजियो कि हम ही ने सीना-सिपर किया

दिल ज़ख़्मी हो के तुझ तईं पहुँचा तो कम नहीं

इस नीम-कुश्ता ने भी क़यामत जिगर किया

है कौन आप में जो मिले तुझ से मस्त नाज़

ज़ौक़-ए-ख़बर ही ने तो हमें बे-ख़बर क्या

वो दश्त-ए-ख़ौफ़-नाक रहा है मिरा वतन

सुन कर जिसे ख़िज़्र ने सफ़र से हज़र किया

कुछ कम नहीं हैं शोबदा-बाज़ों से मय-गुसार

दारू पिला के शैख़ को आदम से ख़र किया

हैं चारों तरफ़ खे़मे खड़े गर्द-बाद के

क्या जानिए जुनूँ ने इरादा किधर किया

लुक्नत तिरी ज़बान की है सहर जिस से शोख़

यक हर्फ़-ए-नीम-गुफ़्ता ने दिल पर असर किया

बे-शर्म महज़ है वो गुनहगार जिन ने 'मीर'

अब्र-ए-करम के सामने दामाँ तर किया

स्रोत :
  • पुस्तक : मीरियात - दीवान नंo- 1, ग़ज़ल नंo- 0074

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