अहमद आमेठवी के शेर
ज़िंदगी है अपने क़ब्ज़े में न अपने बस में मौत
आदमी मजबूर है और किस क़दर मजबूर है
ज़िंदगी है अपने क़ब्ज़े में न अपने बस में मौत
आदमी मजबूर है और किस क़दर मजबूर है
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere