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अजमल सिद्दीक़ी

1981 | दिल्ली, भारत

अजमल सिद्दीक़ी

ग़ज़ल 12

अशआर 13

आस पे तेरी बिखरा देता हूँ कमरे की सब चीज़ें

आस बिखरने पर सब चीज़ें ख़ुद ही उठा के रखता हूँ

बोल पड़ता तो मिरी बात मिरी ही रहती

ख़ामुशी ने हैं दिए सब को फ़साने क्या क्या

ये ही हैं दिन, बाग़ी अगर बनना है बन

तुझ पर सितम किस को पता फिर हो हो

अलग अलग तासीरें इन की, अश्कों के जो धारे हैं

इश्क़ में टपकें तो हैं मोती, नफ़रत में अंगारे हैं

कभी ख़ौफ़ था तिरे हिज्र का कभी आरज़ू के ज़वाल का

रहा हिज्र-ओ-वस्ल के दरमियाँ तुझे खो सका मैं पा सका

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