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अलीम अख़्तर मुज़फ़्फ़र नगरी

1914 - 1972 | मुजफ्फरनगर, भारत

पूर्वाधुनिक शायर, क्लासिकी रंग में ग़ज़लें कहीं. मासिक ‘शमा’ से सम्बद्ध रहे, बच्चों के लिए लिखी गई नज़्मों का एक संग्रह भी प्रकाशित हुआ

पूर्वाधुनिक शायर, क्लासिकी रंग में ग़ज़लें कहीं. मासिक ‘शमा’ से सम्बद्ध रहे, बच्चों के लिए लिखी गई नज़्मों का एक संग्रह भी प्रकाशित हुआ

अलीम अख़्तर मुज़फ़्फ़र नगरी

ग़ज़ल 9

नज़्म 3

 

अशआर 10

दर्द बढ़ कर दवा हो जाए

ज़िंदगी बे-मज़ा हो जाए

मेरी बेताबियों से घबरा कर

कोई मुझ से ख़फ़ा हो जाए

दर्द का फिर मज़ा है जब 'अख़्तर'

दर्द ख़ुद चारासाज़ हो जाए

ये और बात कि इक़रार कर सकें कभी

मिरी वफ़ा का मगर उन को ए'तिबार तो है

हमें दुनिया में अपने ग़म से मतलब

ज़माने की ख़ुशी से वास्ता क्या

पुस्तकें 3

 

ऑडियो 9

किसी के वादा-ए-फ़र्दा पर ए'तिबार तो है

तू अगर दिल-नवाज़ हो जाए

दर्द बढ़ कर दवा न हो जाए

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