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आसिफ़ साक़िब

1939

आसिफ़ साक़िब

ग़ज़ल 9

नज़्म 1

 

अशआर 7

किस दर्जा मुनाफ़िक़ हैं सब अहल-ए-हवस 'साक़िब'

अंदर से तो पत्थर हैं और लगते हैं पानी से

समेट ले गए सब रहमतें कहाँ मेहमान

मकान काटता फिरता है मेज़बानों को

रस्ते की अंजान ख़ुशी है

मंज़िल का अन-जाना डर है

क़ैदी रिहा हुए थे पहन कर नए लिबास

हम तो क़फ़स से ओढ़ के ज़ंजीर चल पड़े

सीने के बीच 'साक़िब' ऐसा है मरना जीना

इक याद जी उठी थी इक याद मर गई है

गीत 1

 

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