आसिम तन्हा
ग़ज़ल 10
अशआर 5
कहीं सूरज नज़र आता नहीं है
हुकूमत शहर में अब धुँद की है
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
डूबता हूँ तो मुझे हाथ कई मिलते हैं
कितनी हसरत से किनारों की तरफ़ देखता हूँ
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
जो मंज़िलों के निशानात दे रही हैं तुम्हें
हमारी गूँज भी शामिल है इन सदाओं में
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
तुम्हारे घर के रस्ते की उदासी ख़त्म हो जाए
मुझे घर तक बुलाने से तुम्हें क्या फ़र्क़ पड़ता है
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
गुमान कहता है मेरा कि एक दिन मुझ पर
तिरी वफ़ा तिरी चाहत का मान बरसेगा
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए