बहराम तारिक़
ग़ज़ल 1
अशआर 1
धूप बढ़ते ही जुदा हो जाएगा
साया-ए-दीवार भी दीवार से
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere