aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
1866 - 1928 | पटना, भारत
शाद अज़ीमाबादी के प्रिय शागिर्दों में शामिल
असर न पूछिए साक़ी की मस्त आँखों का
ये देखिए कि कोई होश्यार बाक़ी है
तड़प के रह गई बुलबुल क़फ़स में ऐ सय्याद
ये क्या कहा कि अभी तक बहार बाक़ी है
कितने इल्ज़ाम आख़िर अपने सर
तुम ने ग़ैरों को सर चढ़ा के लिए
Kalam-e-Betab
असर न पूछिए साक़ी की मस्त आँखों का ये देखिए कि कोई होश्यार बाक़ी है
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