दीपक पुरोहित
ग़ज़ल 4
अशआर 21
यूँ गुफ़्तुगू-ए-उल्फ़त दिलचस्प हम करेंगे
आँखों से तुम कहोगे आँखों से हम सुनेंगे
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वतन-परस्ती हमारा मज़हब हैं जिस्म-ओ-जाँ मुल्क की अमानत
करेंगे बरपा क़हर अदू पर रहेगा दाइम वतन सलामत
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ये कैसी बद-दुआ' दी है किसी ने
समुंदर हूँ मगर खारा हुआ हूँ
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अज़ल से बरसे है पाकीज़गी फ़लक से यहाँ
नुमायाँ होवे है फिर शक्ल-ए-बहन में वो यहाँ
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अच्छा हुआ ज़बान-ए-ख़मोशी न तुम पढ़े
शिकवे मिरे वगर्ना रुलाते तुम्हें बहुत
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