फ़ैज़ान आरिफ़
ग़ज़ल 7
नज़्म 1
अशआर 4
जहाँ फ़ैज़ान-ए-आबादी बहुत है
वहाँ पर भी घने जंगल रहे थे
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ये काएनात की तस्वीर ना-मुकम्मल है
अभी तो इस में बहुत रंग उस ने भरना है
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मिरा मिज़ाज नहीं है मगर मुझे 'फैज़ान'
किसी के वास्ते इक अहद से मुकरना है
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मैं चुप नहीं हूँ किसी मस्लहत के पेश-ए-नज़र
मैं जानता हूँ कहाँ इख़्तिलाफ़ करना है
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