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फ़ैज़ान उमर

ग़ज़ल 8

अशआर 9

किसी की क़ब्र पे जैसे निशानी रख्खी हो

कुछ इस तरह से तिरा ग़म ख़ुशी पे रक्खा है

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ग़ज़ल रखा है तिरा नाम इस लिए मुझ को

सभी पुकारते हैं ‘आशिक़-ए-ग़ज़ल कह कर

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बचा हुआ था मिरे पास एक शख़्स 'उमर'

उसे भी मुझ से मगर जनवरी ने छीन लिया

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वो पल सुकूँ का कहता है सारा जहाँ जिसे

अल्लाह जानता है तिरे बिन नहीं मिला

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वो लोग भी फ़िराक़ पे कहने लगे ग़ज़ल

दो दिन भी ठीक से जो अलम में नहीं रहे

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