फ़राज़ हामिदी
नज़्म 1
अशआर 1
ज़लज़ला आया और आ कर हो गया रुख़्सत मगर
वक़्त के रुख़ पर तबाही की इबारत लिख गया
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere