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फ़रियाद आज़र

1956 - - | दिल्ली, भारत

फ़रियाद आज़र

ग़ज़ल 9

शेर 10

अदा हुआ क़र्ज़ और वजूद ख़त्म हो गया

मैं ज़िंदगी का देते देते सूद ख़त्म हो गया

ऐसी ख़ुशियाँ तो किताबों में मिलेंगी शायद

ख़त्म अब घर का तसव्वुर है मकाँ बाक़ी है

बंद हो जाता है कूज़े में कभी दरिया भी

और कभी क़तरा समुंदर में बदल जाता है

जो दूर रह के उड़ाता रहा मज़ाक़ मिरा

क़रीब आया तो रोया गले लगा के मुझे

इस तमाशे का सबब वर्ना कहाँ बाक़ी है

अब भी कुछ लोग हैं ज़िंदा कि जहाँ बाक़ी है

पुस्तकें 3

Khizan Mera Mausam

 

1994

Qiston Mein Guzarti Zindagi

 

2005

Intisab

Fariyad Aazar Number : Shumara Number-080

 

 

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