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हबीब हैदराबादी

1924 - 1989 | लंदन, यूनाइटेड किंगडम

हबीब हैदराबादी

ग़ज़ल 2

 

अशआर 3

इंसान की बुलंदी पस्ती को देख कर

इंसाँ कहाँ खड़ा है हमें सोचना पड़ा

आगे निकल गए थे ज़रा अपने-आप से

हम को 'हबीब' ख़ुद की तरफ़ लौटना पड़ा

'हबीब' इस ज़िंदगी के पेच-ओ-ख़म से हम भी नालाँ हैं

हमें झूटे नगीनों की चमक भाती नहीं शायद

 

पुस्तकें 1

 

चित्र शायरी 1

 

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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