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हफ़ीज़ जालंधरी

1900 - 1982 | लाहौर, पाकिस्तान

लोकप्रिय रूमानी शायर, पाकिस्तान का राष्ट्रगान लिखा

लोकप्रिय रूमानी शायर, पाकिस्तान का राष्ट्रगान लिखा

हफ़ीज़ जालंधरी

ग़ज़ल 69

नज़्म 29

अशआर 80

इरादे बाँधता हूँ सोचता हूँ तोड़ देता हूँ

कहीं ऐसा हो जाए कहीं ऐसा हो जाए

देखा जो खा के तीर कमीं-गाह की तरफ़

अपने ही दोस्तों से मुलाक़ात हो गई

दोस्तों को भी मिले दर्द की दौलत या रब

मेरा अपना ही भला हो मुझे मंज़ूर नहीं

वफ़ा जिस से की बेवफ़ा हो गया

जिसे बुत बनाया ख़ुदा हो गया

कोई चारह नहीं दुआ के सिवा

कोई सुनता नहीं ख़ुदा के सिवा

क़ितआ 20

क़िस्सा 3

 

बच्चों की कहानी 2

 

पुस्तकें 105

चित्र शायरी 8

 

वीडियो 21

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हफ़ीज़ जालंधरी

हफ़ीज़ जालंधरी

वीडियो का सेक्शन
शायर अपना कलाम पढ़ते हुए

हफ़ीज़ जालंधरी

हफ़ीज़ जालंधरी

हफ़ीज़ जालंधरी

जवानी के तराने गा रहा हूँ

हफ़ीज़ जालंधरी

सिमट आए हैं घर में वीराने

हफ़ीज़ जालंधरी

जवानी के तराने गा रहा हूँ

हफ़ीज़ जालंधरी

जहाँ क़तरे को तरसाया गया हूँ

हफ़ीज़ जालंधरी

मस्तों पे उँगलियाँ न उठाओ बहार में

हफ़ीज़ जालंधरी

हम ही में थी न कोई बात याद न तुम को आ सके

हफ़ीज़ जालंधरी

ऑडियो 7

अभी तो मैं जवान हूँ

आख़िरी रात

'इक़बाल' के मज़ार पर

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"लाहौर" के और शायर

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