हैरत गोंडवी
ग़ज़ल 8
अशआर 7
ग़रीबी अमीरी है क़िस्मत का सौदा
मिलो आदमी की तरह आदमी से
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हुस्न है काफ़िर बनाने के लिए
इश्क़ है ईमान लाने के लिए
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मुझे ऐ रहनुमा अब छोड़ तन्हा
मैं ख़ुद को आज़माना चाहता हूँ
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रह रह के कौंदती हैं अंधेरे में बिजलियाँ
तुम याद कर रहे हो कि याद आ रहे हो तुम
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गुलों से नहीं शाख़ के दिल से पूछो
कि ये बद-नुमा ख़ार कितना हसीं है
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