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इमाम बख़्श नासिख़

1772 - 1838 | लखनऊ, भारत

लखनऊ के मुम्ताज़ और नई राह बनाने वाले शायर/मिर्ज़ा ग़ालिब के समकालीन

लखनऊ के मुम्ताज़ और नई राह बनाने वाले शायर/मिर्ज़ा ग़ालिब के समकालीन

इमाम बख़्श नासिख़

ग़ज़ल 44

शेर 48

ज़िंदगी ज़िंदा-दिली का है नाम

मुर्दा-दिल ख़ाक जिया करते हैं

तेरी सूरत से किसी की नहीं मिलती सूरत

हम जहाँ में तिरी तस्वीर लिए फिरते हैं

वो नहीं भूलता जहाँ जाऊँ

हाए मैं क्या करूँ कहाँ जाऊँ

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सियह-बख़्ती में कब कोई किसी का साथ देता है

कि तारीकी में साया भी जुदा रहता है इंसाँ से

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आने में सदा देर लगाते ही रहे तुम

जाते रहे हम जान से आते ही रहे तुम

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पुस्तकें 27

ऑडियो 5

चैन दुनिया में ज़मीं से ता-फ़लक दम भर नहीं

ज़ोर है गर्मी-ए-बाज़ार तिरे कूचे में

सनम कूचा तिरा है और मैं हूँ

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aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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