जालिब नोमानी
ग़ज़ल 2
अशआर 2
पिघलते देख के सूरज की गर्मी
अभी मासूम किरनें रो गई हैं
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ख़ुद अपने आप से लर्ज़ां रही उलझती रही
उठा न बार-ए-गराँ रात की जवानी से
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