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फ़िल्मी गीत1
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल 46
नज़्म 17
अशआर 32
ये इल्म का सौदा ये रिसाले ये किताबें
इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिए हैं
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लोग कहते हैं कि तू अब भी ख़फ़ा है मुझ से
तेरी आँखों ने तो कुछ और कहा है मुझ से
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सौ चाँद भी चमकेंगे तो क्या बात बनेगी
तुम आए तो इस रात की औक़ात बनेगी
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अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें
कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं
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और क्या इस से ज़ियादा कोई नर्मी बरतूँ
दिल के ज़ख़्मों को छुआ है तिरे गालों की तरह
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फ़िल्मी गीत 1
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ऑडियो 31
अच्छा है उन से कोई तक़ाज़ा किया न जाए
अशआ'र मिरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं
अशआ'र मिरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं
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