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खलील तनवीर

1944

खलील तनवीर

ग़ज़ल 14

नज़्म 17

अशआर 31

औरों की बुराई को देखूँ वो नज़र दे

हाँ अपनी बुराई को परखने का हुनर दे

रुस्वा हुए ज़लील हुए दर-ब-दर हुए

हक़ बात लब पे आई तो हम बे-हुनर हुए

वो लोग अपने आप में कितने अज़ीम थे

जो अपने दुश्मनों से भी नफ़रत कर सके

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तेरी आमद की मुंतज़िर आँखें

बुझ गईं ख़ाक हो गए रस्ते

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परिंद शाख़ पे तन्हा उदास बैठा है

उड़ान भूल गया मुद्दतों की बंदिश में

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पुस्तकें 2

 

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