ख़ावर एजाज़

ग़ज़ल 18

शेर 12

मुझे इस ख़्वाब ने इक अर्से तक बे-ताब रक्खा है

इक ऊँची छत है और छत पर कोई महताब रक्खा है

मिरे सेहन पर खुला आसमान रहे कि मैं

उसे धूप छाँव में बाँटना नहीं चाहता

हाथ लगाते ही मिट्टी का ढेर हुए

कैसे कैसे रंग भरे थे ख़्वाबों में

जहाँ तुम हो वहाँ से दूर पड़ती है ज़मीं मेरी

जहाँ मैं हूँ वहाँ से आसमाँ नज़दीक पड़ता है

सुना रही है जिसे जोड़ जोड़ कर दुनिया

तमाम टुकड़े हैं वो मेरी दास्तान के ही

पुस्तकें 8

Aankhen Rang Aur Khwab

 

2008

Dhiyan

 

2008

Nairang-e-Ghazal

Part-002

2018

Nairang-e-Ghazal

Part-003

2018

Nairang-e-Ghazal

Part-001

2018

Sajan

 

2006

Sheeshe Ke Kanwal

 

1975

Tamseel

 

2015

 

ऑडियो 6

कभी मैं चुप कभी हर्फ़-ए-बयाँ में रहता हूँ

कहीं रुकने लगी है कश्ती-ए-उम्र-ए-रवाँ शायद

दरून-ए-जाँ का शगूफ़ा जला हुआ निकला

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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