ख़ुर्शीद रिज़वी
ग़ज़ल 66
नज़्म 15
अशआर 27
आख़िर को हँस पड़ेंगे किसी एक बात पर
रोना तमाम उम्र का बे-कार जाएगा
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तू मुझे बनते बिगड़ते हुए अब ग़ौर से देख
वक़्त कल चाक पे रहने दे न रहने दे मुझे
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तमाम उम्र अकेले में तुझ से बातें कीं
तमाम उम्र तिरे रू-ब-रू ख़मोश रहे
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ये दौर वो है कि बैठे रहो चराग़-तले
सभी को बज़्म में देखो मगर दिखाई न दो
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- ग़ज़ल देखिए
दो हर्फ़ तसल्ली के जिस ने भी कहे उस को
अफ़्साना सुना डाला तस्वीर दिखा डाली
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