लईक़ अकबर सहाब
ग़ज़ल 7
नज़्म 1
अशआर 2
आईना दिल का तोड़ के कहता है संग-ज़न
दिल तेरा तोड़ कर मुझे अच्छा नहीं लगा
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आईना दिल का तोड़ के कहता है संग-ज़न
दिल तेरा तोड़ कर मुझे अच्छा नहीं लगा
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ज़ख़्म कारी बहुत लगा दिल पर
तीर अपनों ने इक चलाया था
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ज़ख़्म कारी बहुत लगा दिल पर
तीर अपनों ने इक चलाया था
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