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मिर्ज़ा हादी रुस्वा

1858 - 1931 | लखनऊ, भारत

मिर्ज़ा हादी रुस्वा

ग़ज़ल 3

 

अशआर 18

दिल्ली छुटी थी पहले अब लखनऊ भी छोड़ें

दो शहर थे ये अपने दोनों तबाह निकले

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मरने के दिन क़रीब हैं शायद कि हयात

तुझ से तबीअ'त अपनी बहुत सैर हो गई

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क्या कहूँ तुझ से मोहब्बत वो बला है हमदम

मुझ को इबरत हुई ग़ैर के मर जाने से

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देखा है मुझे अपनी ख़ुशामद में जो मसरूफ़

इस बुत को ये धोका है कि इस्लाम यही है

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बा'द तौबा के भी है दिल में ये हसरत बाक़ी

दे के क़स्में कोई इक जाम पिला दे हम को

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aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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