मुहम्मद अय्यूब ज़ौक़ी
ग़ज़ल 9
अशआर 11
रखते हैं जो अल्लाह की क़ुदरत पे भरोसा
दुनिया में किसी की वो ख़ुशामद नहीं करते
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रास्ते में मिल गए तो पूछ लेते हैं मिज़ाज
इस से बढ़ कर और क्या उन की इनायत चाहिए
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हदीस-ए-दिल ब-ज़बान-ए-नज़र भी कह न सका
हुज़ूर-ए-हुस्न बढ़ी और बेबसी मेरी
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- ग़ज़ल देखिए
उन की निगाह-ए-लुत्फ़ की तासीर क्या कहूँ
ज़र्रे को आफ़्ताब बना कर चले गए
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ख़ुदा जाने ये सोज़-ए-ज़बत है या ज़ख़्म-ए-नाकामी
कभी होती न थी सीने में लेकिन ये जलन पहले
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