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मुमताज़ अतहर

1953 | पाकिस्तान

मुमताज़ अतहर

ग़ज़ल 4

 

अशआर 4

फ़क़त आँखें चराग़ों की तरह से जल रही हैं

किसी की दस्तरस में है कहाँ कोई सितारा

मिरे ख़िलाफ़ शहादत है मो'तबर सब की

मगर किसी से किसी का बयाँ नहीं मिलता

'अक्स रखता था अपनी ज़ात में अपना कोई

कितने चेहरे आईनों के सामने रक्खे गए

मुझे दाएरों के हुजूम में कहीं भेज दे

मिरी वुसअतों को दवाम कर कफ़-ए-कूज़ा-गर

पुस्तकें 1

 

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