क़ैसर शमीम
ग़ज़ल 10
अशआर 6
किसी मंज़िल में भी हासिल न हुआ दिल को क़रार
ज़िंदगी ख़्वाहिश-ए-नाकाम ही करते गुज़री
- अपने फ़ेवरेट में शामिल कीजिए
-
शेयर कीजिए
उस के आँगन में रौशनी थी मगर
घर के अंदर बड़ा अँधेरा था
- अपने फ़ेवरेट में शामिल कीजिए
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
मौसम 'अजीब रहता है दिल के दयार का
आगे हैं लू के झोंके भी ठंडी हवा के बा'द
- अपने फ़ेवरेट में शामिल कीजिए
-
शेयर कीजिए
सब्ज़ मौसम से मुझे क्या लेना
शाख़ से अपनी जुदा हूँ बाबा
- अपने फ़ेवरेट में शामिल कीजिए
-
शेयर कीजिए
मेरा मज़हब इश्क़ का मज़हब जिस में कोई तफ़रीक़ नहीं
मेरे हल्क़े में आते हैं 'तुलसी' भी और 'जामी' भी
- अपने फ़ेवरेट में शामिल कीजिए
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए