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रज़ा अज़ीमाबादी

रज़ा अज़ीमाबादी

ग़ज़ल 38

अशआर 25

देखी थी एक रात तिरी ज़ुल्फ़ ख़्वाब में

फिर जब तलक जिया मैं परेशान ही रहा

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सौ ईद अगर ज़माने में लाए फ़लक व-लेक

घर से हमारे माह-ए-मुहर्रम जाएगा

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यारब तू उस के दिल से सदा रखियो ग़म को दूर

जिस ने किसी के दिल को कभी शादमाँ किया

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सब कुछ पढ़ाया हम को मुदर्रिस ने इश्क़ के

मिलता है जिस से यार ऐसी पढ़ाई बात

काबे में शैख़ मुझ को समझे ज़लील लेकिन

सौ शुक्र मय-कदे में है ए'तिबार अपना

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पुस्तकें 2

 

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