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रज़ा हमदानी

1910 - 1999 | पेशावर, पाकिस्तान

रज़ा हमदानी

ग़ज़ल 17

अशआर 8

भँवर से लड़ो तुंद लहरों से उलझो

कहाँ तक चलोगे किनारे किनारे

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इक बार जो टूटे तो कभी जुड़ नहीं सकता

आईना नहीं दिल मगर आईना-नुमा है

अजब चीज़ है ये मोहब्बत की बाज़ी

जो हारे वो जीते जो जीते वो हारे

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ता'ना देते हो मुझे जीने का

ज़िंदगी मेरी ख़ता हो जैसे

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पास-ए-आदाब-ए-वफ़ा था कि शिकस्ता-पाई

बे-ख़ुदी में भी हम हद से गुज़रने पाए

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पुस्तकें 3

 

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Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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