साक़िब लखनवी
ग़ज़ल 46
अशआर 19
ज़माना बड़े शौक़ से सुन रहा था
हमीं सो गए दास्ताँ कहते कहते
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बाग़बाँ ने आग दी जब आशियाने को मिरे
जिन पे तकिया था वही पत्ते हवा देने लगे
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आधी से ज़ियादा शब-ए-ग़म काट चुका हूँ
अब भी अगर आ जाओ तो ये रात बड़ी है
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मुट्ठियों में ख़ाक ले कर दोस्त आए वक़्त-ए-दफ़्न
ज़िंदगी भर की मोहब्बत का सिला देने लगे
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मुश्किल-ए-इश्क़ में लाज़िम है तहम्मुल 'साक़िब'
बात बिगड़ी हुई बनती नहीं घबराने से
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