सरवत ज़ेहरा
ग़ज़ल 17
नज़्म 27
अशआर 13
जाने वाले को चले जाना है
फिर भी रस्मन ही पुकारा जाए
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ख़्वाब और तमन्ना का क्या हिसाब रखना है
ख़्वाहिशें हैं सदियों की उम्र तो ज़रा सी है
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मिरे जज़्बों को ये लफ़्ज़ों की बंदिश मार देती है
किसी से क्या कहूँ क्या ज़ात के अंदर बनाती हूँ
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वक़्त भी अब मिरा मरहम नहीं होने पाता
दर्द कैसा है जो मद्धम नहीं होने पाता
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शायर अपना कलाम पढ़ते हुए
