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सीमाब अकबराबादी

1880 - 1951 | कराची, पाकिस्तान

अग्रणी पूर्व-आधुनिक शायरों में विख्यात, सैंकड़ों शागिर्दों के उस्ताद।

अग्रणी पूर्व-आधुनिक शायरों में विख्यात, सैंकड़ों शागिर्दों के उस्ताद।

सीमाब अकबराबादी

ग़ज़ल 61

नज़्म 13

अशआर 46

उम्र-ए-दराज़ माँग के लाई थी चार दिन

दो आरज़ू में कट गए दो इंतिज़ार में

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दिल की बिसात क्या थी निगाह-ए-जमाल में

इक आईना था टूट गया देख-भाल में

माज़ी-ए-मरहूम की नाकामियों का ज़िक्र छोड़

ज़िंदगी की फ़ुर्सत-ए-बाक़ी से कोई काम ले

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रोज़ कहता हूँ कि अब उन को देखूँगा कभी

रोज़ उस कूचे में इक काम निकल आता है

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परेशाँ होने वालों को सुकूँ कुछ मिल भी जाता है

परेशाँ करने वालों की परेशानी नहीं जाती

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