Shahryar's Photo'

शहरयार

1936 - 2012 | अलीगढ़, भारत

अग्रणी आधुनिक उर्दू शायरों में शामिल। फ़िल्म गीतकार , ' फ़िल्म उमराव जान ' , के गीतों के लिए प्रसिद्ध। भारतीय ज्ञान पीठ एवार्ड से सम्मानित

अग्रणी आधुनिक उर्दू शायरों में शामिल। फ़िल्म गीतकार , ' फ़िल्म उमराव जान ' , के गीतों के लिए प्रसिद्ध। भारतीय ज्ञान पीठ एवार्ड से सम्मानित

शहरयार

ग़ज़ल 88

शेर 103

कौन सी बात है जो उस में नहीं

उस को देखे मिरी नज़र से कोई

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ख़जिल चराग़ों से अहल-ए-वफ़ा को होना है

कि सरफ़राज़ यहाँ फिर हवा को होना है

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मैं अकेला सही मगर कब तक

नंगी परछाइयों के बीच रहूँ

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हम जुदा हो गए आग़ाज़-ए-सफ़र से पहले

जाने किस सम्त हमें राह-ए-वफ़ा ले जाती

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हर तरफ़ अपने को बिखरा पाओगे

आइनों को तोड़ के पछताओगे

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दोहा 1

टूटी फूटी कश्तियाँ दरिया में गिर्दाब

मेरे मरने के लिए ये लम्हे नायाब

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पुस्तकें 89

Dhund Ki Roshni

 

2003

Hasil

 

1977

Hasil-e-Sair-e-Jahan

Kulliyat-e-Shaharyar

2001

Intakhaab-e-Kalaam Khaleel-Ur-Rahmaan Aazmi

 

1991

Intikhab Apna Apna

 

1987

Intikhab-e-Kalam Khalil-ur-Rahman Azmi

 

1991

Ism-e-Aazam

 

1965

Khwab Ka Dar Band Hai

 

1985

मज़ामीन ख़लीलुर्रहमान आज़मी

खण्ड-001

2004

Mere Hisse Ki Zameen

Part-001

1999

चित्र शायरी 25

सब का ख़ुशी से फ़ासला एक क़दम है हर घर में बस एक ही कमरा कम है

ज़िंदगी जब भी तिरी बज़्म में लाती है हमें ये ज़मीं चाँद से बेहतर नज़र आती है हमें सुर्ख़ फूलों से महक उठती हैं दिल की राहें दिन ढले यूँ तिरी आवाज़ बुलाती है हमें याद तेरी कभी दस्तक कभी सरगोशी से रात के पिछले-पहर रोज़ जगाती है हमें हर मुलाक़ात का अंजाम जुदाई क्यूँ है अब तो हर वक़्त यही बात सताती है हमें

अक्स-ए-याद-ए-यार को धुँदला किया है मैं ने ख़ुद को जान कर तन्हा किया है

दर्द के फूल भी खिलते हैं बिखर जाते हैं ज़ख़्म कैसे भी हों कुछ रोज़ में भर जाते हैं रास्ता रोके खड़ी है यही उलझन कब से कोई पूछे तो कहें क्या कि किधर जाते हैं छत की कड़ियों से उतरते हैं मिरे ख़्वाब मगर मेरी दीवारों से टकरा के बिखर जाते हैं नर्म अल्फ़ाज़ भली बातें मोहज़्ज़ब लहजे पहली बारिश ही में ये रंग उतर जाते हैं उस दरीचे में भी अब कोई नहीं और हम भी सर झुकाए हुए चुप-चाप गुज़र जाते हैं

मेरे लिए रात ने आज फ़राहम किया एक नया मरहला नींदों से ख़ाली किया अश्कों से फिर भर दिया कासा मिरी आँख का और कहा कान में मैं ने हर इक जुर्म से तुम को बरी कर दिया मैं ने सदा के लिए तुम को रिहा कर दिया जाओ जिधर चाहो तुम जागो कि सो जाओ तुम ख़्वाब का दर बंद है

वीडियो 10

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वीडियो का सेक्शन
शायर अपना कलाम पढ़ते हुए
Shahryar reading his poetry

शहरयार

ज़िंदगी जैसी तवक़्क़ो' थी नहीं कुछ कम है

शहरयार

ऑडियो 25

ऐसे हिज्र के मौसम कब कब आते हैं

दिल में रखता है न पलकों पे बिठाता है मुझे

अजीब सानेहा मुझ पर गुज़र गया यारो

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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