सोज़ होशियारपूरी
ग़ज़ल 5
अशआर 8
दिल मिरा दर्द के सिवा क्या है
इब्तिदा ये तो इंतिहा क्या है
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मैं ने हर तख़रीब में देखी है इक ता'मीर भी
मेरा मिट जाना भी है हिम्मत-फ़ज़ा मेरे लिए
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ऐ मोहब्बत तुझे ख़बर होगी
दर्द उठ उठ के ढूँढता क्या है
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पीने को यूँ तो शैख़ भी तैयार हैं मगर
कहते हैं शर्त ये है गिरह से न ज़र खुले
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एक पर्दा सा है फ़रेब-ए-नज़र
ये भी उट्ठे तो देखना क्या है
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