aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
ज़ाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठ कर
या वो जगह बता दे जहाँ पर ख़ुदा न हो
न ख़ुदा ही मिला न विसाल-ए-सनम न इधर के हुए न उधर के हुए
रहे दिल में हमारे ये रंज-ओ-अलम न इधर के हुए न उधर के हुए
अगर फ़िरदौस बर-रू-ए-ज़मीं अस्त
हमीं अस्त ओ हमीं अस्त ओ हमीं अस्त
कभी तेरा दर कभी दर-ब-दर कभी 'अर्श पर कभी फ़र्श पर
ग़म-ए-'आशिक़ी तिरा शुक्रिया मैं कहाँ कहाँ से गुज़र गया
सलीक़े से हवाओं में जो ख़ुशबू घोल सकते हैं
अभी कुछ लोग बाक़ी हैं जो उर्दू बोल सकते हैं
Bahar-e-Kashmeer
Bait-ul-Muqaddas Ki Talash
1981
Bhaag Bahar
कई जवाबों से अच्छी है ख़ामुशी मेरी न जाने कितने सवालों की आबरू रक्खे
रोज़ सोचा है भूल जाऊँ तुझे रोज़ ये बात भूल जाता हूँ
मुझ को छाँव में रखा और ख़ुद भी वो जलता रहा मैं ने देखा इक फ़रिश्ता बाप की परछाईं में
पलकों की हद को तोड़ के दामन पे आ गिरा इक अश्क मेरे सब्र की तौहीन कर गया
जिन के किरदार से आती हो सदाक़त की महक उन की तदरीस से पत्थर भी पिघल सकते हैं
उस मुल्क की सरहद को कोई छू नहीं सकता जिस मुल्क की सरहद की निगहबान हैं आँखें
जो एक लफ़्ज़ की ख़ुशबू न रख सका महफ़ूज़ मैं उस के हाथ में पूरी किताब क्या देता
मिल के होती थी कभी ईद भी दीवाली भी अब ये हालत है कि डर डर के गले मिलते हैं
देखा हिलाल-ए-ईद तो तुम याद आ गए इस महवियत में ईद हमारी गुज़र गई
सरहदें रोक न पाएँगी कभी रिश्तों को ख़ुश्बूओं पर न कभी कोई भी पहरा निकला
लोरी 1
गीत 2
पहेली 37
फ़िल्मी गीत 1
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