वासिफ़ अली वासिफ़
ग़ज़ल 39
अशआर 29
महशर से कम नहीं है ये हंगाम-ए-ज़िंदगी
फिरते हैं लाखों आदमी तन्हा नगर में गुम
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ये है मय-ख़ाना-ओ-सनम-ख़ाना
राह के इंतिख़ाब के दिन हैं
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यार की याद बन के रहता है
ज़ख़्म का इंदिमाल क्या होगा
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मिल चुके ख़ाक में मगर तेरा
दिल अभी इंतिज़ार करता है
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तुम्हारी बे-रुख़ी को ख़ाक परवा
तिरी महफ़िल में कोई ख़ाक आए
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