ज़किया ग़ज़ल
ग़ज़ल 29
अशआर 25
आस है साँस के उखड़ने तक
आज की रात हम पे भारी है
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किसी के घर में लगाई है आग अपनों ने
तमाशा देख रही हैं तमाश-बीं आँखें
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उदास रात की भीगी सी पहली बारिश को
किसी की आँख की फैली नमी में देखा गया
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ये क्या हुआ है मुझे चैन क्यों नहीं आता
किसी की आँख से आँसू कहीं गिरा है क्या
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