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कपास का फूल

अहमद नदीम क़ासमी

कपास का फूल

अहमद नदीम क़ासमी

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    स्टोरीलाइन

    अधूरी रह गई मोहब्बत में सारी ज़िंदगी तन्हा गुज़ार देने वाली एक बूढ़ी औरत की कहानी। उसके पास जीने का कोई जवाज़ नहीं बचा है और वह हरदम मौत को पुकारती रहती है। तभी उसकी ज़िंदगी में एक नौजवान लड़की आती है, जो कपास के फूल की तरह नर्म और नाजु़क है। वह उसका ख़्याल रखती है और यक़ीन दिलाती है कि इस बुरे वक़्त में उसकी क़द्र करने वाला कोई है। मगर उन्हीं दिनों भारतीय फ़ौज गाँव पर हमला कर देती है और माई ताजो का वह फूल किसी कीड़े की तरह मसल दिया जाता है।

    माई ताजो हर रात को एक घंटे तो ज़रूर सो लेती थी लेकिन लेकिन उस रात ग़ुस्से ने उसे इतना ‎सा भी सोने की मोहलत दी। पौ फटे जब वो खाट पर से उतर कर पानी पीने के लिए घड़े की ‎तरफ़ जाने लगी तो दूसरे ही क़दम पर उसे चक्कर गया था और वो गिर पड़ी थी। गिरते हुए ‎उसका सर खाट के पाए से टकरा गया था और वो बेहोश हो गई थी।

    ये बड़ा अ'जीब मंज़र था। रात के अँधेरे में सुब्ह-हौले हौले घुल रही थी। चिड़ियाँ एक दूसरे को रात ‎के ख़्वाब सुनाने लगी थीं। बा’ज़ परिंदे पर हिलाए बग़ैर फ़िज़ा में यूँ तैर रहे थे जैसे मसनूई हैं और ‎कूक ख़त्म हो गई तो गिर पड़ेंगे। हवा बहुत नर्म थी और उसमें हल्की-हल्की लतीफ़ सी ख़ुनकी थी। ‎मस्जिद में वारिस अ'ली अज़ान दे रहा था।

    ये वही सुरीली अज़ान थी जिसके बारे में एक सिख स्मगलर ने ये कह कर पूरे गाँव को हँसा दिया ‎था कि अगर मैंने वारिस अ'ली की तीन चार अज़ानें और सुन लीं तो वाहेगुरु की क़सम ख़ाके कहता ‎हूँ कि मेरे मुसलमान हो जाने का ख़तरा है।

    अज़ान की आवाज़ पर घरों में घुमर-घुमर चलती हुई मधानियाँ रोक ली गई थीं। चारों तरफ़ सिर्फ़ ‎अज़ान हुक्मरान थी और इस माहौल में माई ताजो अपनी खाट के पास ढेर पड़ी थी। उसकी कनपटी ‎के पास उसके सफ़ेद बाल अपने ही ख़ून से लाल हो रहे थे।

    मगर ये कोई अ'जीब बात नहीं थी, माई ताजो को तो जैसे बेहोश होने की आ'दत थी। हर आठवें-‎दसवें रोज़ वो सुब्ह को खाट से उठते ही बेहोश हो जाती थी। एक-बार तो वो सुब्ह से दोपहर तक ‎बेहोश पड़ी रही थी और चंद च्यूँटियाँ भी उसे मुर्दा समझ कर उस पर चढ़ आई थीं और उसकी ‎झुर्रियों में भटकने लगी थीं।

    तब पड़ोस से चौधरी फ़त्हदीन की बेटी राहताँ पंजों के बल खड़ी हो कर दीवार पर से झाँकी थी और ‎पूछा था माई! आज लस्सी नहीं लोगी क्या? फिर उसकी नज़र बेहोश माई पर पड़ी थी और उसकी ‎चीख़ सुनकर उसका बाप और भाई दीवार फाँद कर आए थे और माई के चेहरे पर पानी के छींटे ‎मार-मार कर और उसके मुँह में शकर डाल-डाल कर ख़ासी देर के बा'द उसे होश में लाए थे। हकीम ‎मुनव्वर अ'ली की तशख़ीस ये थी कि माई ख़ाली पेट सोती है।

    उस दिन से राहताँ को मा'मूल हो गया था कि वो शाम को एक रोटी पर दाल तरकारी रखकर लाती ‎और जब तक माई खाने से फ़ारिग़ हो जाती, वहीं पर बैठी माई की बातें सुनती रहती। एक दिन ‎माई ने कहा था, “मैं तो हर वक़्त तैयार रहती हूँ बेटी कि जाने कब ऊपर से बुलावा जाए। जिस ‎दिन मैं सुब्ह को तुम्हारे घर लस्सी लेने आई तो समझ लेना मैं चली गई। तब तुम आना और ‎इधर वो चारपाई तले संदूक़ रखा है ना, उसमें से मेरा कफ़न निकाल लेना, कभी दिखाऊँगी तुम्हें। ‎वारिस अ'ली से कह कि मौलवी अब्दुल मजीद से उसपर ख़ाके पाक से कलमा-ए-शहादत भी लिखवा ‎लिया था। डरती हूँ उसे बार-बार निकालूँगी तो कहीं ख़ाकॱ-ए-पाक झड़ ही जाए। बस यूँ समझ लो ‎कि ये वो लट्ठा है जिससे बादशाह-ज़ादियाँ बुर्क़े सिलाती होंगी।

    कपास के ख़ास फूलों की रुई से तैयार होता है ये कपड़ा। टीन के पतरे की तरह खड़खड़ बोलता है। ‎चक्की पीस-पीस कर कमाया है। मैं लोगों को उम्र-भर आटा देती रही हूँ और उनसे कफ़न लेती रही ‎हूँ। क्यों बेटी! ये कोई घाटे का सौदा था? नहीं था ना! मैं डरती हूँ कि कहीं खद्दर का कफ़न पहन ‎कर जाऊँ तो लोग जन्नत में भी मुझसे चक्की ही पिसवाने लगें।”‎

    फिर अपने पोपले मुँह से मुस्कुराकर उसने पूछा था, “तुम्हें दिखाऊँ?”‎

    ‎“न माई!”, राहताँ ने डर कर कहा था, “ख़ाक-ए-पाक झड़ गई तो!”‎

    फिर उसने मौज़ू’ बदलने की कोशिश की, “अभी तो तुम बीस साल और जियोगी तुम्हारे माथे पर तो ‎पाँच लकीरें हैं। पाँच-बीसियाँ सौ!”‎

    माई का हाथ फ़ौरन अपने माथे की तरफ़ उठ गया, “हाय पाँच कहाँ हैं बेटी, कुल चार हैं। पाँचवी तो ‎यहाँ से टूटी हुई है। तू छुरी की नोक से दोनों टुकड़ों को मिला दे तो शायद ज़रा सा और जी लूँ। तेरे ‎घर की लस्सी थोड़ी सी और पी लूँ।”‎

    माई के पोपले मुँह पर एक-बार फिर गोल सी मुस्कुराहट पैदा हुई।

    इस पर राहताँ ने ज़ोर से हँसकर आस-पास फैले हुए कफ़न और काफ़ूर की बूओं से पीछा छुड़ाने की ‎कोशिश की मगर कफ़न और जनाज़े से मुफ़िर था। यही तो माई के महबूब मौज़ू’ थे।

    वैसे राहताँ को माई ताजो से उन्स ही इसलिए था कि वो हमेशा अपने मरने ही की बातें करती थी ‎जैसे मरना ही उसकी सबसे बड़ी कामयाबी हो और जब राहताँ ने एक-बार मज़ाक़-मज़ाक़ में माई से ‎वा'दा किया था कि उसके मरने के बा'द वो उसे यही कफ़न पहना कर अपने बाप की मिन्नत करेगी ‎कि माई का बड़ा ही शानदार जनाज़ा निकाला जाए तो माई इतनी ख़ुश हुई थी कि जैसे उसे नई ‎ज़िंदगी मिल गई है।

    राहताँ सोचती थी कि ये कैसी बद-नसीब है जिसका पूरी दुनिया में कोई भी अपना नहीं है और जब ‎ये मरी तो किसी आँख से एक भी तो आँसू नहीं टपकेगा। बा’ज़ मौतें कितनी आबाद और बा’ज़ ‎कितनी वीरान होती हैं। ख़ुद राहताँ का नन्हा भाई कुँए में गिर कर मर गया था तो क्या शानदार ‎मातम हुआ था। कई दिन तक बैन होते रहे थे और घर से बाहर चौपाल पर दूर दूर से फ़ातिहा-‎ख़्वानी के लिए आने वालों के ठट लगे रहे थे।

    और फिर उन्ही दिनों करीमे नाई का बच्चा निमोनिए से मरा तो बस इतना हुआ कि उस रोज़ करीमे ‎के घर का चूल्हा ठंडा रहा और तीसरे ही रोज़ वो चौपाल पर बैठा चौधरी फ़त्हदीन का ख़त बना रहा ‎था। मौत में ऐसा फ़र्क़ नहीं होना चाहिए। मर कर तो सब बराबर हो जाते हैं। सब मिट्टी में दफ़्न ‎होते हैं। अमीरों की क़ब्रों के लिए मिट्टी