हाली का तनक़ीदी (आलोचनात्मक) कारनामा: पुरानी शायरी का ख़ात्मा और ग़ालिब का बचाव
इस मज़मून (लेख) में जायज़ा लिया गया है कि किस तरह मौलाना हाली ने 'मुक़द्दमा-ए-शेर-ओ-शायरी' के ज़रिए रिवायती (पारंपरिक) ग़ज़ल को ख़ारिज किया, लेकिन अपने तनक़ीदी विचारों को इस तरह पेश किया कि उनके उस्ताद मिर्ज़ा ग़ालिब की अज़मत (महानता) पर कोई आंच न आए।