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अल्ताफ़ हुसैन हाली पर स्कॉलर

हाली का तनक़ीदी (आलोचनात्मक) कारनामा: पुरानी शायरी का ख़ात्मा और ग़ालिब का बचाव

इस मज़मून (लेख) में जायज़ा लिया गया है कि किस तरह मौलाना हाली ने 'मुक़द्दमा-ए-शेर-ओ-शायरी' के ज़रिए रिवायती (पारंपरिक) ग़ज़ल को ख़ारिज किया, लेकिन अपने तनक़ीदी विचारों को इस तरह पेश किया कि उनके उस्ताद मिर्ज़ा ग़ालिब की अज़मत (महानता) पर कोई आंच न आए।

बदलते हुए सामाजिक मापदंड और क्लासिकी शायरी का अध्ययन

वक़्त के साथ ज़ौक़ (पसंद) बदलता है, लेकिन क्लासिकी विषयों को महज़ सामाजिक दबाव या आधुनिकता के आधार पर ख़ारिज करना एक ग़ैर-आलोचनात्मक रवैया है।

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