हुस्न पर ग़ज़लें

हम हुस्न को देख सकते

हैं, महसूस कर सकते हैं इस से लुत्फ़ उठा सकते हैं लेकिन इस का बयान आसान नहीं। हमारा ये शेरी इन्तिख़ाब हुस्न देख कर पैदा होने वाले आपके एहसासात की तस्वीर गिरी है। आप देखेंगे कि शाइरों ने कितने अछूते और नए नए ढंग से हसन और इस की मुख़्तलिफ़ सूरतों को बयान किया। हमारा ये इन्तिख़ाब आपको हुस्न को एक बड़े और कुशादा कैनवस पर देखने का अहल भी बनाएगा। आप उसे पढ़िए और हुस्न-परस्तों में आम कीजिए।

परतव-ए-साग़र-ए-सहबा क्या था

असरार-उल-हक़ मजाज़

बैठे हैं भीगी ज़ुल्फ़ परेशाँ किए हुए

सलाहुद्दीन फ़ाइक़ बुरहानपुरी
बोलिए