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इस्तिआरा पर स्कॉलर

इस्तिआरा (रूपक) और अलामत (प्रतीक) का बुनियादी फ़र्क़

इस्तिआरा (रूपक) और अलामत (प्रतीक) के बीच के नाज़ुक फ़र्क़ की वज़ाहत; इस्तिआरा मुशाहिदे (अवलोकन) पर आधारित होता है, जबकि अलामत एक गहरे इल्म (ज्ञान) और कई मानी को ज़ाहिर करती है।

झीनी-झीनी बीनी चदरिया: कबीर की रूपकीय व्यवस्था और इंसानी वुजूद

कबीर ने अपने पेशे यानी कपड़ा बुनने की शब्दावली का इस्तेमाल करते हुए इंसानी ज़िंदगी, रूह और कायनात के पेचीदा फ़लसफ़े को एक निहायत ख़ूबसूरत और अछूते रूपक में ढाल दिया।

मीर की शायरी में इस्तिआरा (रूपक), किनाया (संकेत) और क़ौल-ए-मुहाल (विरोधाभास) का इस्तेमाल

यह लेख मीर तक़ी मीर की शायरी में इस्तिआरे (रूपक) और किनाये (संकेत) के पेचीदा इस्तेमाल पर रोशनी डालता है, और पश्चिमी आलोचना के हवालों से साबित करता है कि मीर के यहाँ इस्तिआरे महज़ सजावट नहीं बल्कि क़ौल-ए-मुहाल (विरोधाभास) और तंज़ (व्यंग्य) का ज़रिआ है।

मीर तक़ी मीर और रोज़मर्रा की ज़बान का रचनात्मक कमाल

मीर तक़ी मीर का सबसे बड़ा कारनामा यह है कि उन्होंने आम बोल-चाल और रोज़मर्रा की ज़बान को इस्तिआरे (रूपक) और रिआयत (शब्दों के तालमेल) के ज़रिए महान शायरी की ज़बान में बदल दिया।

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