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बाक़र मेहदी

1927 - 2006 | मुंबई, भारत

प्रमुख आलोचक, अपनी बेबाकी और परम्परा-विरोध के लिए विख्यात

प्रमुख आलोचक, अपनी बेबाकी और परम्परा-विरोध के लिए विख्यात

बाक़र मेहदी

लेख 14

उद्धरण 19

आज़ादी की ख़्वाहिश ख़ुद-ब-ख़ुद नहीं पैदा होती। इसके लिए बड़ा ख़ून पानी करना पड़ता है, वर्ना अक्सर लोग उन्हीं ‎राहों पर चलते‏‎ रहना पसंद करते हैं जिन पर उनके वालिदैन अपने नक़्श-ए-पा छोड़ गए हैं।

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हम आज के दौर को इसलिए तनक़ीदी दौर कहते हैं कि तख़लीक़ी अदब की रफ़्तार कम है और मे'यारी चीज़ें नहीं ‎लिखी जा रही ‎‏हैं।

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अदब की तख़लीक़ एक ग़रीब मुल्क में पेशा भी नहीं बन सकती और इस तरह बेशतर अदीब-ओ-शाइ'र इतवारी‏‎ ‎मुसव्विर (SUNDAY PAINTERS‏‎) की ज़िंदगी बसर करते हैं, या'नी ज़रूरी कामों से फ़ुर्सत मिली तो पढ़ लिख लिया।

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इंसानी तारीख़ एक मआ'नी में इक़्तिदार की जंग की तारीख़ कही जा सकती है।

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अब ग़ालिब उर्दू में एक सनअ'त‏‎ Industry की हैसियत इख़्तियार कर चुके हैं। ये इतनी बड़ी और फैली हुई नहीं ‎जितनी कि ‎‏यूरोप और अमरीका में शेक्सपियर इंडस्ट्री। हाँ आहिस्ता-आहिस्ता ग़ालिब भी ‎‏High Cultured Project ‎में ढल‏‎ रही है। ये कोई शिकायत की बात नहीं है। हर ज़बान-ओ-अदब में एक एक शाइ'र या अदीब को ये ए'ज़ाज़ ‎मिलता रहा है कि ‎‏उसके ज़रिए' से सैकड़ों लोग बा-रोज़गार हो जाते हैं।

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रेखाचित्र 2

 

शेर 20

सैलाब-ए-ज़िंदगी के सहारे बढ़े चलो

साहिल पे रहने वालों का नाम-ओ-निशाँ नहीं

मुझे दुश्मन से अपने इश्क़ सा है

मैं तन्हा आदमी की दोस्ती हूँ

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फ़ासले ऐसे कि इक उम्र में तय हो सकें

क़ुर्बतें ऐसी कि ख़ुद मुझ में जनम है उस का

जाने क्यूँ उन से मिलते रहते हैं

ख़ुश वो क्या होंगे जब ख़फ़ा ही नहीं

आज़मा लो कि दिल को चैन आए

ये कहना कहीं वफ़ा ही नहीं

ग़ज़ल 34

रुबाई 30

पुस्तकें 33

अागही-ओ-बेबाकी

 

1965

अदबी मराहिल

 

1994

Baqar Mehdi Asari Aagahi-o-Shayari

 

2005

Ehtijaj Ka Doosra Naam Baqar Mehdi

 

2002

Fikr-o-Fughan

 

1989

Izhar

Pahli Kitab

 

Izhar

Khaleel-ur-Rahman Aazmi Number : Shumara Number-004

 

Izhar

 

1978

Izhar

 

1978

Izhar

Dusri Kitab

1975

ऑडियो 20

अब ख़ानुमाँ-ख़राब की मंज़िल यहाँ नहीं

इश्क़ की सारी बातें ऐ दिल पागल-पन की बातें हैं

इस दर्जा हुआ ख़ुश कि डरा दिल से बहुत मैं

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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